Wednesday, November 20, 2024

अभिव्यक्ति और मध्यम कक्षा बारह है

 

कक्षा-12 अभिव्यक्ति और माध्यम

 



पाठ्य पुस्तक 'अभिव्यक्ति और माध्यम' (जनसंचार और सृजनात्मक लेखन)

पाठ संख्या- 3, 4, 5 (वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

 11,12 और 13 पर आधारित वर्णनात्मक प्रश्न 



पाठ-3, विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन 

प्रिंट माध्यम (मुद्रित माध्यम)-

1.प्रिंट मीडिया से क्या आशय है ?

छपाई वाले संचार माध्यम को प्रिंट मीडिया कहते हैं। इसे मुद्रण-माध्यम भी कहा जाता है। समाचार-पत्र पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि इसके प्रमुख रूप हैं।

2. जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम कौन-सा है ?

जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम प्रिंट माध्यम है।

3. आधुनिक छापाखाने का आविष्कार किसने किया ?

आधुनिक छापाखाने का आविष्कार जर्मनी के गुटेनबर्ग ने किया।

4. भारत में पहला छापाखाना कब और कहाँ पर खुला था ?

भारत में पहला छापाखाना सन् 1556 में गोवा में खुला, इसे ईसाई मिशनरियों ने धर्म-प्रचार की पुस्तकें छापने के लिए खोला था।

5. जनसंचार के मुद्रित माध्यम कौन-कौन से हैं ?

मुद्रित माध्यमों के अन्तर्गत अखबार, पत्रिकाएँ पुस्तकें आदि आती हैं।

6. मुद्रित माध्यम की विशेषताएँ लिखिए।

• छपे हुए शब्दों में स्थायित्व होता है, इन्हें सुविधानुसार किसी भी प्रकार से पढ़ा जा सकता है।

• यह माध्यम लिखित भाषा का विस्तार है।

• यह चिंतन, विचार-विश्लेषण का माध्यम है।

7. मुद्रित माध्यम की सीमाएँ (दोष) लिखिए।

• निरक्षरों के लिए मुद्रित माध्यम किसी काम के नहीं होते।

• ये तुरंत घटी घटनाओं को संचालित नहीं कर सकते।

• इसमें स्पेस तथा शब्द सीमा का ध्यान रखना पड़ता है।

• इसमें एक बार समाचार छप जाने के बाद अशुद्धि-सुधार नहीं किया जा सकता।

8. मुद्रित माध्यमों के लेखन के लिए लिखते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?

• भाषागत शुद्धता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

• प्रचलित भाषा का प्रयोग किया जाए।

• समय, शब्द व स्थान की सीमा का ध्यान रखा जाना चाहिए।

• लेखन में तारतम्यता एवं सहज प्रवाह होना चाहिए।

रेडियो (आकाशवाणी)

1. इलैक्ट्रानिक माध्यम से क्या तात्पर्य है ?

जिस जन संचार में इलैकट्रानिक उपकरणों का सहारा लिया जाता है इलैक्ट्रानिक माध्यम कहते हैं। रेडियो, दूरदर्शन, इंटरनेट प्रमुख इलैक्ट्रानिक माध्यम हैं।

2. ऑल इंडिया रेडियो की विधिवत स्थापना कब हुई ?

सन् १९३६ में

3. एफ़.एम. रेडियो की शुरुआत कब से हुई ?

एफ़.एम. (फ़िक्वेंसी माड्युलेशन) रेडियो की शुरुआत सन् १९९३ से हुई।

4. रेडियो किस प्रकार का माध्यम है ?

रेडियो एक इलैक्ट्रोनिक श्रव्य माध्यम है। इसमें शब्द एवं आवाज का महत्त्व होता है। यह एक रेखीय माध्यम है।

5. रेडियो समाचार किस शैली पर आधारित होते हैं ?

रेडियो समाचार की संरचना उल्टापिरामिड शैली पर आधारित होती है।

6. उल्टा पिरामिड शैली क्या है ? यह कितने भागों में बँटी होती है ?

जिसमें तथ्यों को महत्त्व के क्रम से प्रस्तुत किया जाता है, सर्वप्रथम सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण तथ्य को तथा उसके उपरांत महत्त्व की दृष्टि से घटते क्रम में तथ्यों को रखा जाता है उसे उल्टा पिरामिड शैली कहते हैं। उल्टापिरामिड शैली में समाचार को तीन भागों में बाँटा जाता है- इंट्रो, बॉडी और समापन।

7. रेडियो समाचार-लेखन के लिए किन-किन बुनियादी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए ?

• समाचार वाचन के लिए तैयार की गई कापी साफ़-सुथरी ओ टाइप्ड कॉपी हो।

• कॉपी को ट्रिपल स्पेस में टाइप किया जाना चाहिए।

• पर्याप्त हाशिया छोड़ा जाना चाहिए।

• अंकों को लिखने में सावधानी रखनी चाहिए।

• संक्षिप्ताक्षरों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए।

टेलीविजन (दूरदर्शन):

8. दूरदर्शन जनसंचार का किस प्रकार का माध्यम है ?

दूरदर्शन जनसंचार का सबसे लोकप्रिय व सशक्त माध्यम है। इसमें ध्वनियों के साथ-साथ दृश्यों का भी समावेश होता है। इसके लिए समाचार लिखते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि शब्द व पर्दे पर दिखने वाले दृश्य में समानता हो।

9. भारत में टेलीविजन का आरंभ और विकास किस प्रकार हुआ ?

भारत में टेलीविजन का प्रारंभ 15 सितंबर 1959 को हुआ। यूनेस्को की एक शैक्षिक परियोजना के अन्तर्गत दिल्ली के आसपास के एक गाँव में दो टी.वी. सैट लगाए गए, जिन्हें 200 लोगों ने देखा। 1967 के बाद विधिवत टीवी सेवा आरंभ हुई। 1976 में दूरदर्शन नामक निकाय की स्थापना हुई।

10. टी०वी० खबरों के विभिन्न चरणों को लिखिए।

दूरदर्शन मे कोई भी सूचना निम्न चरणों या सोपानों को पार कर दर्शकों तक पहुँचती है।

(1) फ़्लैश या ब्रेकिंग न्यूज (समाचार को कम-से-कम शब्दों में दर्शकों तक तत्काल पहुँचाना)

(2) ड्राई एंकर (एंकर द्वारा शब्दों में खबर के विषय में बताया जाता है)

(3) फ़ोन इन (एंकर रिपोर्टर से फ़ोन पर बात कर दर्शकों तक सूचनाएँ पहुँचाता है)

(4) एंकर-विजुअल (समाचार के साथ-साथ संबंधित दृश्यों को दिखाया जाना)

(5) एंकर-बाइट (एंकर का प्रत्यक्षदर्शी या संबंधित व्यक्ति के कथन या बातचीत द्वारा प्रामाणिक खबर प्रस्तुत करना)

(6) लाइव (घटनास्थल से खबर का सीधा प्रसारण)

(7) एंकर-पैकेज (इसमें एंकर द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ; संबंधित घटना के दृश्य, बाइट, ग्राफ़िक्स आदि द्वारा व्यवस्थित ढंग से दिखाई जाती हैं)

इंटरनेट

11. इंटरनेट क्या है ? इसके गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए।

इंटरनेट विश्वव्यापी अंतर्जाल है, यह जनसंचार का सबसे नवीन व लोकप्रिय माध्यम है। इसमें जनसंचार के सभी माध्यमों के गुण समाहित हैं। यह जहाँ सूचना, मनोरंजन, ज्ञान और व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक संवादों के आदान-प्रदान के लिए श्रेष्ठ माध्यम है, वहीं अश्लीलता, दुष्प्रचारव गंदगी फ़ैलाने का भी जरिया है।

12. इंटरनेट पत्रकारिता क्या है ?

इंटरनेट (विश्व्यापी अंतर्जाल) पर समाचारों का प्रकाशन या आदान-प्रदान इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है। इंटरनेट पत्रकारिता दो रूपों में होती है। प्रथम- समाचार संप्रेषण के लिए नेट का प्रयोग करना। दूसरा- रिपोर्टर अपने समाचार को ई-मेल द्वारा अन्यत्र भेजने व समाचार को संकलित करने तथा उसकी सत्यता, विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए करता है।

13. इंटरनेट पत्रकारिता को और किन-किन नामों से जाना जाता है ?

ऑनलाइन पत्रकारिता, साइबरपत्रकारिता, वेब पत्रकारिता आदि नामों से।

14. विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास किन-किन चरणों में हुआ ?

विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास निम्नलिखित चरणों में हुआ

• प्रथम चरण ——- १९८२ से १९९२

• द्वितीय चरण ——- १९९३ से २००१

• तृतीय चरण ——- २००२ से अब तक

15. भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का प्रारम्भ कब से हुआ ?

पहला चरण १९९३ से तथा दूसरा चरण २००३ से शुरू माना जाता है। भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटें ‘रीडिफ़ डॉट कॉम’, ‘इंडियाइंफ़ोलाइन’ व ‘सीफ़ी’ हैं। रीडिफ को भारत की पहली साइट कहा जाता है।

16. वेबसाइट पर विशुद्धपत्रकारिता शुरू करने का श्रेय किसको जाता है ?

‘तहलका डॉटकॉम’

17. भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटों के नाम लिखिए।

‘रीडिफ़ डॉट कॉम’, ‘इंडियाइंफ़ोलाइन’ व ‘सीफ़ी’

18. भारत में कौन-कौन से समाचार-पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं ?

टाइम्स आफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रैस, हिंदू, ट्रिब्यून आदि।

19. भारत की कौन-सी नेट-साइट भुगतान देकर देखी जा सकती है ?

‘इंडिया टुडे’

20. भारत की पहली साइट कौन-सी है , जो इंटरनेट पर पत्रकारिता कर रही हैं ?

रीडिफ

21. सिर्फ़ नेट पर उपलब्ध अखबार का नाम लिखिए।

“प्रभा साक्षी” नाम का अखबार प्रिंट रूप में न होकर सिर्फ़ नेट पर उपलब्ध है।

22. पत्रकारिता के लिहाज से हिंदी की सर्वश्रेष्ठ साइट कौन-सी है ?

पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ साइट बीबीसी की हैं, जो इंटरनेट के मानदंडों के अनुसार चल रही है।

23. हिंदी वेब जगत में कौन-कौनसी साहित्यिक पत्रिकाएँ चल रही हैं ?

हिंदी वेब जगत में ‘अनुभूति’, अभिव्यक्ति, हिंदी नेस्ट, सराय आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ चल रही हैं।

24. हिंदी वेब जगत की सबसे बढ़ी समस्या क्या है ?

हिन्दी वेब जगत की सबसे बड़ी समस्या मानक की-बोर्ड तथा फोंट की है। डायनमिक फोंट के अभाव के कारण हिन्दी की ज्यादातर साइटें खुलती ही नहीं हैं।

अभ्यासार्थ प्रश्नः

1. भारत में पहला छापाखाना किस उद्देश्य से खोला गया?

2. गुटेनबर्ग को किस क्षेत्र में योगदान के लिए याद किया जाता है?

3. रेडियो समाचर किस शैली में लिखे जाते हैं?

4. रेडियो तथा टेलीविजन माध्यमों में मुख्य अंतर क्या है?

5. एंकर बाईट क्या है?

6. समाचार को संकलित करने वाला व्यक्ति क्या कहलाता है?

7. नेट साउंड किसे कहते हैं?

8. ब्रेकिंग न्यूज से आप क्या समझते हैं?

पाठ-4,पत्रकारीय लेखन के विभिन्न रूप 

और लेखन प्रक्रिया

1. पत्रकारीय लेखन क्या है ?

समाचार माध्यमों मे काम करने वाले पत्रकार अपने पाठकों तथा श्रोताओं तक सूचनाएँ पहुँचाने के लिए लेखन के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल करते हैं, इसे ही पत्रकारीय लेखन कहते हैं। पत्रकारीय लेखन का संबंध समसामयिक विषयों, विचारों व घटनाओं से है। पत्रकार को लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए वह सामान्य जनता के लिए लिख रहा है, इसलिए उसकी भाषा सरल व रोचक होनी चाहिए। वाक्य छोटे व सहज हों। कठिन भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। भाषा को प्रभावी बनाने के लिए अनावश्यक विशेषणों, जार्गन्स (अप्रचलित शब्दावली) और क्लीशे (पिष्टोक्ति , दोहराव) का प्रयोग नहीं होना चहिए।

2. पत्रकारीय लेखन के अंतर्गत क्या-क्या आता है ?

पत्रकरिता या पत्रकारीय लेखन के अन्तर्गत समपादकीय, समाचार, आलेख, रिपोर्ट, फीचर, स्तम्भ तथा कार्टून आदि आते हैं।

3. पत्रकारीय लेखन का मुख्य उद्देश्य क्या होता है ?

पत्रकारीय लेखन का प्रमुख उद्देश्य है- सूचना देना, शिक्षित करना तथा मनोरंजन करना आदि होता है।

4. पत्रकारीय लेखन के प्रकार लिखए।

पत्रकारीय लेखन के कई प्रकार हैं यथा- ‘खोजपरक पत्रकारिता’, वॉचडॉग पत्रकारिता और एड्वोकैसी पत्रकारिता आदि।

5. पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं ?

पत्रकार तीन प्रकार के होते हैं-

• पूर्ण कालिक

• अंशकालिक (स्ट्रिंगर)

• फ्रीलांसर या स्वतंत्र पत्रकार

6. समाचार किस शैली में लिखे जाते हैं ?

समाचार उलटा पिरामिड शैली में लिखे जाते हैं, यह समाचार लेखन की सबसे उपयोगी और लोकप्रिय शैली है। इस शैली का विकास अमेरिका में गृह युद्ध के दौरान हुआ। इसमें महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन पहले प्रस्तुत किया जाता है, उसके बाद महत्त्व की दृष्टि से घटते क्रम में घटनाओं को प्रस्तुत कर समाचार का अंत किया जाता है। समाचार में इंट्रो, बॉडी और समापन के क्रम में घटनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।

7. समाचार के छह ककार कौन-कौन से हैं ?

समाचार लिखते समय मुख्य रूप से छह प्रश्नों- क्या , कौन , कहाँ , कब , क्यों और कैसे का उत्तर देने की कोशिश की जाती है। इन्हें समाचार के छह ककार कहा जाता है। प्रथम चार प्रश्नों के उत्तर इंट्रो में तथा अन्य दो के उत्तर समापन से पूर्व बॉडी वाले भाग में दिए जाते हैं।

8. फ़ीचर क्या है ?

फ़ीचर एक प्रकार का सुव्यवस्थित, सृजनात्मक और आत्मनिष्ठ लेखन है।

9. फ़ीचर लेखन का क्या उद्देश्य होता है ?

फ़ीचर का उद्देश्य मुख्य रूप से पाठकों को सूचना देना, शिक्षित करना तथा उनका मनोरंजन करना होता है।

10. फ़ीचर और समाचार में क्या अंतर है ?

समाचार में रिपोर्टर को अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं होती, जबकि फ़ीचर में लेखक को अपनी राय, दृष्टिकोण और भावनाओं को जाहिर करने का अवसर होता है। समाचार उल्टा पिरामिड शैली में लिखे जाते हैं, जबकि फ़ीचर लेखन की कोई सुनिश्चित शैली नहीं होती। फ़ीचर में समाचारों की तरह शब्दों की सीमा नहीं होती। आमतौर पर फ़ीचर, समाचार रिपोर्ट से बड़े होते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः २५० से २००० शब्दों तक के फ़ीचर छपते हैं।

11. विशेष रिपोर्ट से आप क्या समझते हैं ?

सामान्य समाचारों से अलग वे विशेष समाचार जो गहरी छान-बीन, विश्लेषण और व्याख्या के आधार पर प्रकाशित किए जाते हैं, विशेष रिपोर्ट कहलाते हैं।

विशेष रिपोर्ट के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।

(1) खोजी रिपोर्ट: इसमें अनुपल्ब्ध तथ्यों को गहरी छान-बीन कर सार्वजनिक किया जाता है।

(2) इन्डेप्थ रिपोर्ट: सार्वजानिक रूप से प्राप्त तथ्यों की गहरी छान-बीन कर उसके महत्त्वपूर्ण पक्षों को पाठकों के सामने लाया जाता है।

(3) विश्लेषणात्मक रिपोर्ट: इसमें किसी घटना या समस्या का विवरण सूक्ष्मता के साथ विस्तार से दिया जाता है। रिपोर्ट अधिक विस्तृत होने पर कई दिनों तक किस्तों में प्रकाशित की जाती है।

(4) विवरणात्मक रिपोर्ट: इसमें किसी धटना या समस्या को विस्तार एवं बारीकी के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

12. विचारपरक लेखन किसे कहते हैं ?

जिस लेखन में विचार एवं चिंतन की प्रधानता होती है, उसे विचार परक लेखन कहा जाता है। समाचार-पत्रों में समाचार एवं फ़ीचर के अतिरित संपादकीय, लेख, पत्र, टिप्पणी, वरिष्ठ पत्रकारों व विशेषज्ञों के स्तंभ छपते हैं। ये सभी विचारपरक लेखन के अंतर्गत आते हैं।

13. संपादकीय से क्या अभिप्राय है ?

संपादक द्वारा किसी प्रमुख घटना या समस्या पर लिखे गए विचारात्मक लेख को, जिससे संबंधित समाचार पत्र की राय भी कहा जाता है, संपादकीय कहते हैं। संपादकीय किसी एक व्यक्ति का विचार या राय न होकर समग्र पत्र-समूह की राय होता है, इसलिए संपादकीय में संपादक अथवा लेखक का नाम नहीं लिखा जाता।

14. स्तंभ लेखन से क्या तात्पर्य है ?

यह एक प्रकार का विचारात्मक लेखन है। कुछ महत्त्वपूर्ण लेखक अपने खास वैचारिक रुझान एवं लेखन शैली के लिए जाने जाते हैं। ऐसे लेखकों की लोकप्रियता को देखकर समाचरपत्र उन्हें अपने पत्र में नियमित स्तंभ-लेखन की जिम्मेदारी प्रदान करते हैं। इस प्रकार किसी समाचार-पत्र में किसी ऐसे लेखक द्वारा किया गया विशिष्ट एवं नियमित लेखन जो अपनी विशिष्ट शैली एवं वैचारिक रुझान के कारण समाज में ख्याति-प्राप्त हो, स्तंभ लेखन कहा जाता है।

15. संपादक के नाम पत्र से आप क्या समझते हैं ?

समाचार पत्रों में संपादकीय पृष्ठ पर तथा पत्रिकाओं की शुरुआत में संपादक के नाम आए पत्र प्रकाशित किए जाते हैं। यह प्रत्येक समाचारपत्र का नियमित स्तंभ होता है। इसके माध्यम से समाचार-पत्र अपने पाठकों को जनसमस्याओं तथा मुद्दों पर अपने विचार एवम् राय व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।

16. साक्षात्कार/इंटरव्यू से क्या अभिप्राय है ?

किसी पत्रकार के द्वारा अपने समाचारपत्र में प्रकाशित करने के लिए, किसी व्यक्ति विशेष से उसके विषय में अथवा किसी विषय या मुद्दे पर किया गया प्रश्नोत्तरात्मक संवाद साक्षात्कार कहलाता है।

17. ऑप-एड से आप क्या समझते हैं?

"ऑप-एड" मूल रूप से संपादकीय पृष्ठ के सामने प्रकाशित होने वाला वह पन्ना जिस पर विश्लेषण, फ़ीचर, सतंभ, साक्षात्कार और विचारपूर्ण टिप्पणियाँ  प्रकाशित की जाती हैं और यह पृष्ठ किसी अन्य को अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने का मौका प्रदान करता है।

आलेख

आलेख-लेखन हेतु महत्वपूर्ण बातें:

किसी विषय पर सर्वांगपूर्ण जानकारी जो तथ्यात्मक, विश्लेषणात्मक अथवा विचारात्मक हो आलेख कहलाती है।

आलेख का आकार संक्षिप्त होता है।

इसमें विचारों और तथ्यों की स्पष्टता रहती है, ये विचार क्रमबद्ध रूप में होने चाहिए।

विचार या तथ्य की पुनरावृत्ति न हो।

आलेख की शैली विवेचन, विश्लेषण अथवा विचार-प्रधान हो सकती है।

ज्वलंत मुद्दों, समस्याओं, अवसरों, चरित्र पर आलेख लिखे जा सकते हैं।

आलेख गंभीर अध्ययन पर आधारित प्रामाणिक रचना होती है।

नमूना आलेख:

शेर का घर जिमकार्बट नेशनल पार्क-

जंगली जीवों की विभिन्न प्रजातियों को सरंक्षण देने तथा उनकी संख्या को बढाने के उद्देश्य से हिमालय की तराई से लगे उत्तराखंड के पौड़ी और नैनीताल जिले में भारतीय महाद्वीप के पहले राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना प्रसिद्ध अंगरेजी लेखक जिम काबेंट के नाम पर की गई। जिम काबेंट नेंशनल पार्क नैनीताल से एक सौ पन्द्रह किलोमीटर और दिल्ली से 290 किलोमीटर दूर है। यह अभयारण्य पाँच सौं इक्कीस किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। नवम्बर से जून के बीच यहाँ घूमने-फिरने का सर्वोतम समय है।

यह अभयारण्य चार सौं से ग्यारह सौ मीटर की ऊँचाई पर है। ढिकाला इस पार्क का प्रमुख मैदानी स्थल है और कांडा सबसे ऊँचा स्थान हैं। जंगल, जानवर, पहाड़ और हरी-भरी वादियों के वरदान से जिमकार्बट पार्क दुनिया के अनूठे पार्को में है। रायल बंगाल टाइगर और एशियाई हाथी पसंदीदा घर है। यह एशिया का सबसे पहला संरक्षित जंगल हैं। राम गंगा नदी इसकी जीवन-धारा है। यहाँ एक सौ दस तरह के पेड़-पौधे, पचास तरह के स्तनधारी जीव, पच्चीस प्रजातियों के सरीसृप और छह सौं तरह के रंग-बिरंगे पक्षी हैं। हिमालयन तेंदुआ, हिरन, भालू, जंगली कुत्ते, भेड़िये, बंदर, लंगूर, जंगली भैंसे जैसे जानवरों से यह जंगल आबाद है। हर वर्ष लाखों पर्यटक यहाँ आते हैं। शाल वृक्षों से घिरे लंबे-लंबे वन-पथ और हरे-भरे घास के मैदान इसके प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देते हैं।


रिपोर्ट\प्रतिवेदन

रिपोर्ट/प्रतिवेदन का सामान्य अर्थ: सूचनाओं के तथ्यपरक आदान-प्रदान को रिपोर्ट या रिपोर्टिंग कहते हैं। प्रतिवेदन इसका हिंदी रूपांतरण है। रिपोर्ट किसी संस्था, आयोजन या कार्यक्रम की तथ्यात्मक जानकारी है। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने अंशधारकों को वार्षिक/अर्द्धवार्षिक प्रगति रिपोर्ट भेजा करती हैं।

रिपोर्ट के गुणः

• तथ्यों की जानकारी स्पष्ट, सटीक, प्रामाणिक हो।

• संस्था/विभाग के नाम का उल्लेख हो।

• अध्यक्ष आदि पदाधिकारियों के नाम।

• गतिविधियाँ चलानेवालों के नाम।

• कार्यक्रम का उद्देश्य।

• आयोजन-स्थल, दिनांक, दिन तथा समय।

• उपस्थित लोगों की जानकारी।

• दिए गए भाषणों के प्रमुख अंश।

• लिये गए निर्णयों की जानकारी।

• भाषा आलंकारिक या साहित्यिक न होकर सूचनात्मक होनी चाहिए।

• सूचनाएँ अन्यपुरुष शैली में दी जाती हैं। मैं या हम का प्रयोग नहीं होता।

• संक्षिप्तता और क्रमिकता रिपोर्ट के गुण हैं।

• नई बात नए अनुच्छेद से लिखें।

• प्रतिवेदक या रिपोर्टर के हस्ताक्षर।

निम्नलिखित विषयों पर रिपोर्ट तैयार कीजिए-

पूजा-स्थलों पर दर्शनार्थियों की अनियंत्रित भीड़

देश की महॅगी होती व्यावसायिक शिक्षा

मतदान केन्द्र का दृश्य

आए दिन होती सड़क दुर्घटनाएँ

आकस्मिक बाढ़ से हुई जनधन की क्षति

फीचर लेखन-

समकालीन घटना तथा किसी भी क्षेत्र विशेष की विशिष्ट जानकारी के सचित्र तथा मोहक विवरण को फीचर कहते हैं। फीचर मनोरंजक ढंग से तथ्यों को प्रस्तुत करने की कला है। वस्तुतः फीचर मनोरंजन की उंगली थाम कर जानकारी परोसता है। इस प्रकार मानवीय रूचि के विषयों के साथ सीमित समाचार जब चटपटा लेख बन जाता है तो वह फीचर कहा जाता है।

अर्थात- “ज्ञान + मनोरंजन = फीचर”।

फीचर में अतीत, वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा होती है। फीचर लेखक पाठक को वर्तमान दशा से जोड़ता है, अतीत में ले जाता है और भविष्य के सपने भी बुनता है। फीचर लेखन की शैली विशिष्ट होती है। शैली की यह भिन्नता ही फीचर को समाचार, आलेख या रिपोर्ट से अलग श्रेणी में ला कर खड़ा करती है।

फीचर लेखन को अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें –

समाचार साधारण जनभाषा में प्रस्तुत होता है और फीचर एक विशेष वर्ग व विचारधारा पर केंद्रित रहते हुए विशिष्ट शैली में लिखा जाता है।

एक समाचार हर एक पत्र में एक ही स्वरुप में रहता है परन्तु एक ही विषय पर फीचर अलग-अलग पत्रों में अलग-अलग प्रस्तुति लिये होते हैं। फीचर के साथ लेखक का नाम रहता है।

फीचर में अतिरिक्त साज-सज्जा, तथ्यों और कल्पना का रोचक मिश्रण रहता है।

घटना के परिवेश, विविध प्रतिक्रियाएँ व उनके दूरगामी परिणाम भी फीचर में रहा करते हैं।

उद्देश्य की दृष्टि से फीचर तथ्यों की खोज के साथ मार्गदर्शन और मनोरंजन की दुनिया भी प्रस्तुत करता है।

फीचर फोटो-प्रस्तुति से अधिक प्रभावशाली बन जाता है।

नमूना फीचर:

पियक्कड़ तोता:

संगत का असर आता है, फिर चाहे वह आदमी हो या तोता। ब्रिटेन में एक तोते को अपने मालिक की संगत में शराब की ऐसी लत लगी कि उसने घर वालों और पड़ोसियों का जीना बेहाल कर दिया। जब तोते को सुधारने के सारे हथकंडे फेल हो गए तो मजबूरन मालिक को ही शराब छोड़नी पड़ी। मार्क बेटोकियो ने अफ्रीकी प्रजाति का तोला मर्लिन पाला मार्क यदा-कदा शराब पी लेते। गिलास में बची शराब मर्लिन चट कर जाता। धीरे-धीरे मर्लिन की तलब बढ़ने लगी। वह वक्त-बेवक्त शराब माँगने लगा।———————

 आलेख लेखन के मुख्य अंग - 

आलेख में मुख्य रूप से दो अंग होते हैं। प्रथम अंग है भूमिका तथा इसका द्वितीय व महत्वपूर्ण अंग है विषय का प्रतिपादन। भूमिका के अन्तर्गत शीर्षक का अनुरूपण किया जाता है जिसमें भूमिका के अनुरूप संक्षिप्त लेखन द्वारा बात कही जाती है तथा विषय के प्रतिपादन में विषय के क्रमिक विकास, तारतम्यता और क्रमबद्धता का ध्यान रखा जाता है। अन्त में तुलनात्मक विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाला जाता है।


फीचर और आलेख में अन्तर 

 उत्तर -फीचर पाठकों की रुचि के अनुरूप, किसी घटना या किसी विषय की तथ्यपूर्ण रोचक प्रस्तुति है। गहन अध्ययन पर आधारित गम्भीर प्रमाणित लेखन, आलेख की श्रेणी में आता है। 

फीचर मन को प्रभावित करता हैं जबकि आलेख दिमाग को।

फीचर एक प्रकार का गद्य गीत है जबकि आलेख गम्भीर व उच्च स्तर की बहुआयामी गद्य रचना। 

फीचर किसी भी घटना या विषय के कुछ आयामों को छूता है तो आलेख उस घटना के हर पहलू को स्पर्श करता है। 

पत्रकार पी डी टंडन के अनुसार किताबें पढ़कर आंकड़े जमाकरके लेख लिखा जा सकता है।लेकिन फीचर को अपनी आँख, कान, भावों, अनुभूतियों, मनोवेगों और अन्वेषण का सहारा भी लेना पड़ता है। आलेख लम्बा,  गम्भीर और हर व्यक्ति के अनुकूल न होते हुए भी प्रशंसनीय हो सकता है। लेकिन ये बातें  फीचर के लिए जानलेवा हैं। 

फीचर को रोचक, दिलचस्प और सबकी रूचि के अनुसार होना ही होता है।

आलेख में लेखक को उपलब्ध आधार सामग्री के अनुसार गम्भीरतापूर्वक चीजें प्रस्तुत करनी होती हैं,  मगर फीचर लेखक को जीवन और जीवन की समस्याओं पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की भी छटपटाहट होती है।

प्रश्न– लेख अथवा आलेख लेखन क्या होता है? इसकी विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर- लेखों में किसी विषय या मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की जाती है।

लेख में लेखक के विचार तथ्यों और सूचनाओं पर आधारित होते हैं और लेखक उन तथ्यों और सूचनाओं के विश्लेषण और अपने तर्कों के जरिये अपनी राय प्रस्तुत करता है। 

लेख लिखने के लिए पर्याप्त तैयारी जरूरी है। इसके लिए उस विषय से जुड़े सभी तथ्यों और सूचनाओं के अलावा पृष्ठभूमि सामग्री भी जुटानी पड़ती है। 

लेख की कोई एक निश्चित लेखन शैली नहीं होती और हर लेखक की अपनी शैली होती है। लेख का भी एक प्रारंभ, मध्य और अंत होता है। 

लेख का प्रारंभ आकर्षक बन सकता है। इसके बाद तथ्यों की मदद से विश्लेषण करते हुए आखिर में आप अपना निष्कर्ष या मत प्रकट कर सकते हैं। 

अन्य महत्त्वपूर्णं प्रश्नः

1. सामान्य लेखन तथा पत्रकारीय लेखन में क्या अंतर है?

2. पत्रकारीय लेखन के उद्देश्य लिखिए।

3. पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं?

4. उल्टा पिरामिड शैली का विकास कब और क्यों हुआ?

5. समाचार के प्रकारों के नाम लिखिए।

6. फ़ीचर किस शैली में लिखा जाता है?

7. फ़ीचर व समाचार में क्या अंतर है?

8. विशेष रिपोर्ट से आप क्या समझते हैं?

9. विशेष रिपोर्ट के भेद लिखिए।

10.इन डेप्थ रिपोर्ट किसे कहते हैं?

11.विचारपरक लेखन क्या है तथा उसके अन्तर्गत किस प्रकार के लेख आते हैं?

12. स्वतंत्र पत्रकार किसे कहते है?

13. पूर्णकालिक पत्रकार से क्या अभिप्राय है?

14. अंशकालिक पत्रकार क्या होता है?


पाठ-5,विशेष लेखन: स्वरूप और प्रकार


1. विशेष लेखन किसे कहते हैं ?

विशेष लेखन किसी खास विषय पर सामान्य लेखन से हट कर किया गया लेखन है; जिसमें विषय से संबंधित विस्तृत सूचनाएँ प्रदान की जाती हैं।

2. डेस्क क्या है ?

समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टीवी और रेडियो चैनलों में अलग-अलग विषयों पर विशेष लेखन के लिए निर्धारित स्थल को डेस्क कहते हैं और उस विशेष डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों का भी अलग समूह होता है। यथा-व्यापार तथा कारोबार के लिए अलग तथा खेल की खबरों के लिए अलग डेस्क निर्धारित होता है।

3. बीट से क्या तात्पर्य है ?

विभिन्न विषयों से जुड़े समाचारों के लिए संवाददाताओं के बीच काम का विभाजन आम तौर पर उनकी दिलचस्पी और ज्ञान को ध्यान में रख कर किया जाता है। मीडिया की भाषा में इसे बीट कहते हैं।

4. न्यूज पेग से आप क्या समझते हैं?

न्यूज़ पेग का अर्थ है किसी मुद्दे पर लिखे जा रहे लेख या फीचर में उस ताज़ा घटना का उल्लेख, जिसके कारण वह मुद्दा चर्चा में आ गया है। 

जब कोई संवाददाता या डेस्क किसी समाचार या रिपोर्ट के विषय से सम्बंधित अन्य पूर्व घटित घटना, उद्धरण या केस स्टडी का जिक्र उस समाचार या रिपोर्ट में करता है जिससे प्रस्तुत समाचार या रिपोर्ट की प्रासंगिकता और अधिक प्रामाणिक हो जाती है तो समाचार या रिपोर्ट का वह रूप 'न्यूज पेग' कहलाता है।

5. बीट रिपोर्टिंग तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग में क्या अन्तर है ?

बीट रिपोर्टिग के लिए संवाददाता में उस क्षेत्र के बारे में जानकारी व दिलचस्पी का होना पर्याप्त है, साथ ही उसे आम तौर पर अपनी बीट से जुड़ी सामान्य खबरें ही लिखनी होती हैं। किन्तु विशेषीकृत रिपोर्टिंग में सामान्य समाचारों से आगे बढ़कर संबंधित विशेष क्षेत्र या विषय से जुड़ी घटनाओं, समस्याओं और मुद्दों का बारीकी से विश्लेषण कर प्रस्तुतीकरण किया जाता है। बीट कवर करने वाले रिपोर्टर को संवाददाता तथा विशेषीकृत रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर को विशेष संवाददाता कहा जाता है।

6. विशेष लेखन की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

विशेष लेखन की भाषा-शैली सामान्य लेखन से अलग होती है। इसमें संवाददाता को संबंधित विषय की तकनीकी शब्दावली का जान होना आवश्यक होता है, साथ ही यह भी आवश्यक होता है कि वह पाठकों को उस शब्दावली से परिचित कराए जिससे पाठक रिपोर्ट को समझ सकें। विशेष लेखन की कोई निश्चित शैली नहीं होती।

7. विशेष लेखन के क्षेत्र कौन-कौन से हो सकते हैं ?

विशेष लेखन के अनेक क्षेत्र होते हैं, यथा- अर्थ-व्यापार, खेल, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, कृषि, विदेश, रक्षा, पर्यावरण शिक्षा, स्वास्थ्य, फ़िल्म-मनोरंजन, अपराध, कानून व सामाजिक मुद्दे आदि।

विशेष लेखन में कैसे हासिल करें विशेषज्ञता:

पत्रकारीय विशेषज्ञता का अर्थ यह है कि व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित न होने के बावजूद उस विषय या क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं और मुद्दों की आप सहजता से व्याख्या कर सकें और पाठकों के लिए उसके मायने स्पष्ट कर सकें। अपनी रुचि के किसी क्षेत्र विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है- 

● उस विषय से संबंधित पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए। 

● विशेष लेखन के क्षेत्र में सक्रिय लोगों के लिए खुद को अपडेट रखना बहुत जरूरी है।

● विषय से संबंधित जितनी संभव हो , संदर्भ सामग्री जुटाकर रखनी चाहिए।

● उस विषय का शब्दकोश और इनसाइक्लोपीडिया भी पास होना चाहिए।

● विषय से जुड़े सरकारी और गैर सरकारी संगठनों और संस्थाओं की सूची, उनकी बेवसाइट का पता, टेलीफोन नंबर और उसमें काम करने वाले विशेषज्ञों के नाम और फोन नंबर रखने चाहिए। 

कारोबार और व्यापार 

कारोबार और व्यापार और अर्थ जगत का क्षेत्र काफी व्यापक है। इसमें कृषि से लेकर उद्योग तक और व्यापार से लेकर शेयर बाज़ार तक अर्थव्यवस्था से जुड़े सभी क्षेत्र शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करना कठिन है। यही कारण है कि कारोबार और अर्थजगत में भी कोई खास क्षेत्र चुनना पड़ता है। 

• आर्थिक पत्रकार को देश की राजनीति और उसमें हो रहे बदलाव की जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि अर्थनीति और राजनीति के बीच गहरा रिश्ता होता है।

• आर्थिक मामलों की पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता की तुलना में काफ़ी जटिल होती है। आम लोगों को इसकी शब्दावली के बारे में जानकारी नहीं होती है या उसके मतलब के बारे में ठीक से पता नहीं होता है। उसे आम लोगों की समझ में आने लायक बनाना आर्थिक मामलों के जानकार पत्रकार का काम होता है।

खेल :

खेल एक ऐसा क्षेत्र है ,जिसमें अधिकांश लोगों की रुचि होती है। समाचार-पत्र और पत्रिकाओं में खेलों पर विशेष लेखन, खेल विशेषांक और खेल परिशिष्ट प्रकाशित हो रहे हैं। इसी तरह टेलीविजन और रेडियो पर खेलों के विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं।

● पत्र- पत्रिकाओं में खेलों के बारे में लिखने वालों के लिए जरूरी है कि वे खेल की तकनीक, उसके नियमों ,उसकी बारीकियों और उससे जुड़ी तमाम बातों से भली-भाँति परिचित हों।

● खेल में बनने वाले रिकाॅर्ड्स या कीर्तिमानों के बारे में पता होना चाहिए।

● खेल के नियम और उसकी बारीकियाँ या किसी खिलाड़ी की तकनीक के बारे में जानने - समझने वाले ही इस बारे में अच्छा लिख या बोल सकते हैं।

● खेल पत्रकार को अपनी जानकारियों को दिलचस्प तरीके से पेश करना चाहिए।


                         (खण्ड-ख)

पाठ-11 कहानी का नाट्य रूपांतरण


कहानी और नाटक में समानता- 

कहानी और नाटक दोनों में एक कहानी होती है। दोनों में पात्र होते हैं, परिवेश होता है,कहानी का क्रमिक विकास होता है, संवाद होते हैं,द्वंद्व होता है तथा चरम उत्कर्ष होता है। इस तरह हम देखते हैं कि नाटक और कहानी की आत्मा के कुछ मूल तत्व एक ही हैं।

कहानी और नाटक में अंतर  -

• कहानी का संबंध लेखक और पाठक से होता है। जबकि नाटक लेखक, निर्देशक, पात्र, दर्शक/ श्रोता एवं लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है।

• कहानी कही या पढ़ी जाती है जबकि नाटक मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।


प्रश्न 1.नाट्य रूपांतरण में किस प्रकार की मुख्य समस्या का सामना करना पड़ता है ?

उत्तर-नाट्य रूपांतरण करते समय अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है जो इस प्रकार है-

1. सबसे प्रमुख समस्या कहानी के पात्रों के मनोभावों व मानसिक द्वंद्वों की नाटकीय प्रस्तुति में आती है।

2. पात्रों के द्वंद्व को अभिनय के अनुरूप बनाने और संवादों को नाटकीय रूप प्रदान में समस्या आती है।

3. संगीत, ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था करने और कथानक को अभिनय के अनुरूप बनाने में समस्या होती है। 


प्रश्न 2. कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

उत्तर-कहानी अथवा कथानक का नाट्य रूपांतरण करते समय निम्नलिखित आवश्यक बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. कथानक के अनुसार ही दृश्य दिखाए जाने चाहिए।

2. नाटक के दृश्य बनाने से पहले उसका खाका तैयार करना चाहिए।

3. नाटकीय संवादों का कहानी के मूल संवादों के साथ मेल होना चाहिए।

4. कहानी के संवादों को नाट्य रूपांतरण में एक निश्चित स्थान मिलना चाहिए।

5. संवाद सहज, सरल, संक्षिप्त, सटीक, प्रभावशैली और बोलचाल की भाषा में होने चाहिए।

6. संवाद अधिक लंबे और ऊबाऊ नहीं होने चाहिए।


प्रश्न 3. कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय दृश्य विभाजन कैसे करते हैं ?

उत्तर-कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय दृश्य विभाजन निम्न प्रकार करते हैं-

1. कहानी की कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित करके दृश्य बनाए जाते हैं।

2. एक स्थान और समय पर घट रही घटना को एक दृश्य में लिया जाता है।

3. दूसरे स्थान और समय पर घट रही घटना को अलग दृश्यों में बांटा जाता है।

4. दृश्य विभाजन में कथाक्रम और विकास का भी ध्यान रखा जाता है।


प्रश्न 4. कहानी को नाटक में किस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है ?

उत्तर-कहानी को नाटक में रूपांतरित करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है -

1. कहानी की कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित किया जाता है।

2. कहानी में घटित विभिन्न घटनाओं के आधार पर दृश्यों का निर्माण किया जाता है।

3. कथावस्तु से संबंधित वातावरण की व्यवस्था की जाती है।

4: ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है।

5. कथावस्तु के अनुरूप मंच सज्जा और संगीत का निर्माण किया जाता है।

6. पात्रों के द्वंद्व, कथानक और संवादों को अभिनय के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है।


पाठ-12 रेडियो नाटक

कैसे बनता है रेडियो नाटक

रेडियो नाटक : ‘रेडियो नाटक’ नाटक का वह रूप है जो रेडियो पर प्रसारित होता है। रेडियो श्रव्य माध्यम है जिसमें दृश्य (विजुअल्स) नहीं होते और न ही दर्शक और अभिनेता आमने-सामने। रेडियो नाटक लेखन सिनेमा या रंगमंच के लेखन से थोड़ा भिन्न है और कठिन भी। यहाँ आपकी सहायता के लिए न  मंच सज्जा तथा न वस्त्र सज्जा है और न  ही अभिनेता के चेहरे की भाव भंगिमाएं। आपको सब कुछ संवादों और ध्वनि प्रभावों के माध्यम से ही संप्रेषित करना होता है।

अत: रेडियो नाटक लेखन के लिए निम्न बिन्दुओं को मद्देनज़र रखना आवश्यक है –

कहानी का चुनाव- रेडियो नाटक के लिए आवश्यक है कि कहानी ‘एक्शन बेस्ड’ न हो। अर्थात् कहानी ऐसी हो जो पूरी तरह एक्शन पर निर्भर न हो। क्योंकि रेडियो पर बहुत अधिक एक्शन का जहाँ प्रभाव उत्पन्न करना मुश्किल होता है वहीँ श्रोताओं को उबाऊ भी लगता है।

समयावधि-रेडियो नाटक  की अवधि 15 मिनट से 30 मिनट तक की ही होनी चाहिए। क्योंकि रेडियो के श्रोता सिनेमा की तरह ‘कैप्टिव ऑडियंस’ नहीं हैं जो एक निश्चित समय के लिए एक जगह विशेष पर बैठ कर देखने को बाध्य हों। 

पात्रों की संख्या–चूँकि रेडियो नाटक की समयावधि कम होती है और श्रव्य माध्यम होने के कारण पात्रों को सिर्फ उनकी आवाज़ से ही पहचानना होता है इसलिए रेडियो नाटक के पात्रों की संख्या 5-6 होनी चाहिए।

संवाद और ध्वनि प्रभाव–रेडियो नाटक में पात्रों, घटनाओं / दृश्यों सम्बंधित समस्त जानकारी संवादों के ही द्वारा प्राप्त होती है। तो उसी के अनुसार संवाद और ध्वनि का निर्माण / चयन किया जाए।  

 

रेडियो नाटक के तत्व -

रेडियो नाटक में ये 3 तत्व महत्वपूर्ण है- 1. भाषा, 2. ध्वनि और 3. संगीत (इन तीनों के कलात्मक संयोजन से विशेष प्रभाव उत्पन्न किया जाता है।)

1. भाषा-  भाषा केंद्र में है और यह ध्यातव्य है कि भाषित शब्द की शक्ति लिखित शब्द से अधिक होती है और शब्द प्रयोग ऐसे हों जिनका उच्चारण, वाचिक अभिनय संपन्न हो सके।

2. ध्वनि और संगीत- संगीत सामान्यत: दृश्य परिवर्तन और संवाद  के बीच के अंतराल को भरने के लिए उपयोग में आता है तथा नाटक की विषय वस्तु और कथ्य के अनुरूप वातावरण के निर्माण के लिए भी। यह वातावरण अदृश्य होता है इसलिए संगीत की आवश्यकता और भूमिका और बढ़ जाती है। शब्दों के माध्यम से तो वातावरण का सृजन होता ही है संगीत का योगदान भी विशिष्ट होता है।

अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु –

जिन रचनाकारों ने रेडियो नाटक के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है, उनमें से कुछ ये हैं- सिद्धनाथ कुमार, उदय शंकर भट्ट, भगवतीचरण वर्मा, गिरिजाकुमार माथुर, भारत भूषण अग्रवाल और धर्मवीर भारती। धर्मवीर भारती का गीतिनाट्य अंधा युग पहली बार रेडियो से ही प्रसारित किया गया। 

रेडियो नाटक में नरेटर या सूत्रधार हो सकता है। ऐसा होता रहा है।जो काम नरेटर या सूत्रधार करने वाला है वह पात्रों के संवादों के माध्यम से संपन्न हो जाए तो स्थिति अच्छी मानी जाती हैं।

इस प्रकार रेडियो नाटक श्रव्य नाटक है। यह गतिशील है। अतीत, वर्तमान, भविष्य तीनों कालों में इसके माध्यम से गमन किया जा सकता है। यह वाचिक भाषा की शक्ति क्षमता का भरपूर उपयोग करता है। कल्पना तत्व से इसका गहरा संबंध है। यह शब्दों के माध्यम से एक पूरा संसार होता है और दृश्य को दृश्य बनाता है। यह अंतर्मन का नाटक है मितव्ययी भी है। न्यूनतम साधनों से अधिकतम प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता भी है। ध्वनि और संगीत का रचनात्मक उपयोग इसके प्रभाव में वृद्धि करता है।


प्रश्न: 1. रेडियो नाटक और सिनेमा या रंगमंच में क्या-क्या समानता अथवा असमानता है?

उत्तर:  रेडियो एक श्रव्य माध्यम है, जबकि सिनेमा या रंगमंच एक दृश्य माध्यम है। रेडियो नाटक में सब कुछ संवादों एवं ध्वनि प्रभावों के माध्यम से संप्रेषित करना पड़ता है। रेडियो नाटक में मंच सज्जा, वस्त्र सज्जा एवं अभिनेता के चेहरे की भाव-भंगिमाओं का अभाव होता है, जबकि सिनेमा या रंगमंच में ये सभी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं । 


प्रश्न: 2. रेडियो नाटक की अवधि या समय-सीमा पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: सामान्यत: रेडियो नाटक की अवधि 15 से 30 मिनट होती है, इसके अनेक कारण होते हैं; श्रोता अधिकतम 15 से 30 मिनट तक ही एकाग्रता बनाकर रेडियो नाटक को सुन सकता है। नाटक यदि अधिक लंबा या उबाऊ महसूस होता है तो वह किसी दूसरे स्टेशन को ट्यून कर सकता है या फिर उसका ध्यान कहीं ओर जा सकता है। 


प्रश्न: 3. रेडियो नाटक में पात्रों की संख्या के संबंध में अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: रेडियो नाटक में सब कुछ संवादों पर आधारित होता है। इसलिए यदि अधिक पात्र/चरित्र अधिक होंगे तो कथा का उचित विकास नहीं हो पाएगा और रेडियो नाटक का स्वरूप प्रभावित होगा। रेडियो नाटक में दृश्यों का अभाव होने के कारण श्रोता को संवादों को सुनकर ही पात्रों के साथ अपना रिश्ता बनाए रखना पड़ता है क्योंकि श्रोता सिर्फ आवाज़ के सहारे ही पात्रों को याद रख पाता है। 


प्रश्न: 4. रेडियो नाटक के लिए संवाद लिखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

उत्तर: रेडियो नाटक एक श्रव्य माध्यम है। अत: श्रव्य माध्यम होने के कारण रेडियो नाटक में सब कुछ संवादों के माध्यम से सम्पन्न होता है; इसलिए सभी पात्रों/ चरित्रों को अपने संवादों में एक-दूसरे को नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से श्रोता रेडियो नाटक के संवादों के साथ रिश्ता कायम करते हुए नाटक का भरपूर रसास्वादन कर पाएगा।


प्रश्न: 5. रेडियो को मनोरंजन का सबसे सस्ता और सुलभ साधन क्यों माना गया है?

उत्तर: रेडियो एक छोटा यंत्र/मशीन है जिसे आप आसानी से कहीं भी ले जा सकते हो एवं इसका उपयोग कर सकते हो। ऐसे में भारत का आम आदमी रेडियो के माध्यम से ही देश-विदेश की घटनाओं को जान पाता था, कृषि से जुड़ी विभिन्न जनकारियों को प्राप्त कर पाता था। अत: रेडियो भारत की कृषि प्रधान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मनोरंजन का बहुत ही सस्ता एवं लोकप्रिय साधन था।


प्रश्न: 6. रेडियो नाटक लिखते समय हमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

उत्तर: रेडियो नाटक लिखते समय हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

ऐसी कहानी का चयन करना चाहिए जो एक्शन प्रधान न हो।

समय-सीमा का ध्यान रखना चाहिए। 

पात्रों की संख्या कम हो और संवाद छोटे एवं पात्रों के नाम सहित हो 

रेडियो नाटक में सब कुछ ध्वनि प्रभावों के माध्यम से प्रेषित किया जाना है।


प्रश्न:7-कहानी और रेडियो  नाटक की समानताएँ बताइए।

उतर- कहानी और रेडियो नाटक में बहुत सी समानताएँ हैं। इन दोनों में एक कहानी होती है। पात्र होते हैं। परिवेश होता है। कहानी का क्रमिक विकास होता है। संवाद होते हैं। द्वंद्व होता है। चरम उत्कर्ष होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि नाटक और कहानी की आत्मा के  कुछ मूल तत्व एक ही हैं। तथा कहानी और रेडियो नाटक दोनों ही मनुष्यों का मनोरंजन करते हैं।


प्रश्न 8–‘कैप्टिव ऑडियंस’ किसे कहते हैं?

उत्तर–सिनेमा या नाटक में दर्शक अपने घरों से बाहर निकलकर किसी अन्य सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित होते हैं और इन आयोजनों के लिए प्रयास करते हैं। ये सभी लोग अनजान होते हुए भी एक समूह का हिस्सा बनकर एक साथ सिनेमा या नाटक देखते हैं। ये एक समय विशेष के लिए किसी एक प्रेक्षागृह में एक साथ बैठते हैं अर्थात एक स्थान पर क़ैद किए गए होते हैं। इन्हीं कैद हुए दर्शकों को अंग्रेजी में कैप्टिव ऑडियंस कहते हैं। जबकि टेलीविजन या रेडियो पर आम तौर पर इन्सान अपने घर में बैठकर अपनी मर्ज़ी से कार्यक्रमों  को देखता है। 


प्रश्न 9- रेडियो नाटक की कहानी में किन–किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है?

उत्तर— रेडियो नाटक में अनेक बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जो इस प्रकार हैं–

कहानी एक घटना प्रधान न हो—कहानी केवल एक ही घटना पर आधारित नहीं होनी चाहिए 

समय सीमा–अवधि 15 से 30 मिनट तक हो सकती है। रेडियो नाटक की अवधि इससे अधिक नहीं होनी चाहिए 

पात्रों की सीमित संख्या—पात्रों की संख्या सीमित होनी चाहिए। इसमें पात्रों की संख्या 5 या 6 से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसमें श्रोता केवल ध्वनि के सहारे ही पात्रों को याद रख पाता है। 


प्रश्न 10- रेडियो नाटक की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर— रेडियो नाटक में ध्वनि प्रभाव और संवादों का विशेष महत्व है जो इस प्रकार है–

रेडियो नाटक में पात्रों से संबंधित सभी जानकारियां व चारित्रिक विशेषताएं संवादों के द्वारा ही उजागर होती है।

नाटक का पूरा कथानक संवादों पर ही आधारित होता है।

इसमें ध्वनि प्रभावों और संवादों के माध्यम से ही कथा को श्रोताओं तक पहुंचाया जाता है।

संवादों के माध्यम से ही रेडियो नाटक का उद्देश्य स्पष्ट होता है।

संवादों के द्वारा ही श्रोताओं को संदेश दिया जाता है।


प्रश्न 11. रेडियो नाटक और सिनेमा या रंगमंच में क्या-क्या समानता अथवा असमानता है?

उत्तर:  रेडियो एक श्रव्य माध्यम है, जबकि सिनेमा या रंगमंच एक दृश्य माध्यम है। रेडियो नाटक में सब कुछ संवादों एवं ध्वनि प्रभावों के माध्यम से संप्रेषित करना पड़ता है। रेडियो नाटक में मंच सज्जा, वस्त्र सज्जा एवं अभिनेता के चेहरे की भाव-भंगिमाओं का अभाव होता है, जबकि सिनेमा या रंगमंच में ये सभी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं अर्थात् हम कह सकते हैं कि रेडियो नाटक में सब कुछ आवाज के माध्यम से सम्पन्न होता है। 

प्रश्न 12. रेडियो नाटक के लिए संवाद लिखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

उत्तर: जैसा कि हम सब जानते हैं रेडियो नाटक एक श्रव्य माध्यम है। श्रव्य माध्यम में दृश्यों का अभाव होता है। अत: श्रव्य माध्यम होने के कारण रेडियो नाटक में सबकुछ संवादों के माध्यम से सम्पन्न होता है; इसलिए सभी पात्रों/ चरित्रों को अपने संवादों में एक-दूसरे को नाम से संबोधित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से श्रोता रेडियो नाटक के संवादों के साथ रिश्ता कायम करते हुए नाटक का भरपूर रसास्वादन कर पाएगा।


पाठ-13, नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन


1.नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन से क्या तात्पर्य है ?

 उत्तर-किसी नए एवं अप्रत्याशित पर लेखन ,वह लेखन होता है जिस पर लेखन करने की कभी आशा न की गई हो। " कम समय में अपने विचारों को संकलित कर उन्हें सुंदर और आकर्षक ढंग से अभिव्यक्त करने की कला ही अप्रत्याशित लेखन है।"

जब कभी कोई नया और अप्रत्याशित विषय हमारे सम्मुख आता है तो उस पर किया गया लेखन हमारा मौलिक लेखन होता है और वह व्यक्ति की रचनात्मकता को व्यक्त करता है। 


प्रश्न 2. नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

उत्तर-नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. जिस विषय पर लिखना है लेखक को उसकी संपूर्ण जानकारी होनी चाहिए।

2. लेखक को अपने मस्तिष्क में उसकी एक उचित रूपरेखा बना लेनी चाहिए।

3. विषय से जुड़े तथ्यों से उचित तालमेल होना चाहिए।

4. विचार विषय से सुसम्बद्ध तथा संगत होने चाहिए।

5. अप्रत्याशित विषयों के लेखन में 'मैं' शैली का प्रयोग करना चाहिए।

6. अप्रत्याशित विषयों पर लिखते समय लेखक को विषय से हटकर अपनी विद्वता को प्रकट नहीं करना चाहिए।


प्रश्न 3. नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में क्या-क्या बाधाएँ आती हैं ?

उत्तर-नए अथवा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन में अनेक बाधाएँ आती हैं, जो इस प्रकार है-

1. सामान्य रूप से लेखक आत्मनिर्भर होकर अपने विचारों को लिखित रूप देने का अभ्यास नहीं करता।

2. लेखक में मौलिक प्रयास तथा अभ्यास करने की प्रवृत्ति का अभाव होता है।

3. लेखक के पास विषय से संबंधित सामग्री और तथ्यों का अभाव होता है।

4. लेखक की चिंतन शक्ति मंद पड़ जाती है।

5. लेखक के बौद्धिक विकास के अभाव में विचारों की कमी हो जाती है।

6. अप्रत्याशित विषयों पर लेखन करते समय शब्दकोश की कमी हो जाती है।


प्रश्न 4. नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन को किस प्रकार सरल बनाया जा सकता है ?

उत्तर- नए तथा अप्रत्याशित विषयों पर लेखन को सरल बनाने के लिए मन में उठ रहे विचारों को सर्वप्रथम एक रूपरेखा प्रदान करनी चाहिए। तथ्यों  का सुसंबद्ध एवं सुसंगत होना भी जरूरी होता है। अतः किसी भी विषय पर लिखते हुए दो बातों का आपस में जुड़ा होने के साथ-साथ उनमें तालमेल होना भी आवश्यक होता है। नए तथा अप्रत्याशित विषयों के लेखन में आत्मपरक 'मैं' शैली का प्रयोग किया जा सकता है। यद्यपि निबंधों और अन्य आलेखों में 'मैं' शैली का प्रयोग लगभग वर्जित होता है किंतु नए विषय पर लेखन में 'मैं' शैली के प्रयोग से लेखक के विचारों और उसके व्यक्तित्व की झलक प्राप्त होती है।

प्रश्न 5. नए और अप्रत्याशित विषय पर लेखन के  लाभ लिखिए।

उत्तर- नए और अप्रत्याशित विषयों पर लेखन के लाभ निम्नलिखित हैं-

(क) इसके माध्यम से अपने विचारों को किसी के माध्यम से पुष्ट करने की कला में वृद्धि होती है।

(ख) इससे लेखन कला में निखार आता है। लेखन कौशल तथा अभिव्यक्ति कौशल का विकास होता है।

(ग) इससे हम विषय को तार्किक रूप में सुसम्बद्ध तरीके से लिख पाते हैं।

प्रश्न 6. अप्रत्याशित लेखन का बुनियादी नियम सुसम्बद्धता है। कैसे ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- अप्रत्याशित लेखन का बुनियादी नियम सुसम्बद्धता है, क्योंकि इसका उद्देश्य भाषा के माध्यम से किसी विषय पर विचार व्याकरणिक शुद्धता के साथ सुगठित रूप से अभिव्यक्त करना है। विवरण का सुसम्बद्ध होने के साथ सुसंगत होना भी अच्छे लेखन की विशेषता है।

नोट : उपर्युक्त सामग्री इंटरनेट एवं अन्य  विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है। अतः एक बार अपने स्तर पर तथ्यों की प्रमाणिकता की जाँच अवश्य कर लें।



12 टिप्‍पणियां:

  1. एक वृक्ष भी पंडित हो, हो जाए उजियार
    यहाँ विपिन ही पंडित है, वो भी सदाबहार
    जय हो!

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  2. ज्ञानी पंडित की नहीं, इसमें कोई बात।
    जो है अर्पित आपको, स्वीकारो हे तात।।
    स्वीकारो हे तात,न ज्यादा करो बड़ाई।
    एक संकलन मात्र,तथ्य ये सुन लो भाई।
    एक सभी की पीर, बात ये हमने जानी।
    शिक्षक सब हैं एक, न कोई पंडित ज्ञानी।।

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  3. बहुत ही अच्छा कार्य कर रहे हैं सर.., शानदार संकलन... अध्यापक और विद्यार्थी दोनों ही निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे इससे ... आपको बहुत सारा धन्यवाद और बधाइयाँ... 👏👏👏👏👏🙏🙏🙏🙏🙏

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार सर। आपकी सकारात्मक और उर्जस्वित करने वाली टिप्पणी पाकर श्रम सफल हो गया। 🙏🙏

  4. जानी पंडित होना पड़ेगा बनने के लिए शिक्षक
    बाधा हर कर आप इस समय बन गए हैं अधीक्षक
    सुसमय बारिश करते रहिए दस बारह की फसल में
    कितनों की आशाएं बंधी हैं आपके इसी पहल में
    मत मानिए प्रशंसा इसको मान लीजिए तथ्य
    तब भी तो घन सुविधा रूपी होगा ही ये सत्य

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  5. बहुत ही अद्भुत प्रयास सर। इससे हम लोग और विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे🙏🏻

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार सर। आपकी टिप्पणी हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कृतकृत्य हो गया 🙏🙏

  6. अत्यंत सराहनीय कार्य विद्यार्थियों के लिए लाभप्रद

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार सर। आपकी टिप्पणी पाकर श्रम सार्थक हो गया। 🙏🙏

  7. सराहनीय और आवश्यक कार्य आदरणीय

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  8. हार्दिक आभार सर कार्य की सराहना के लिए 🙏

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वितान भाग 2 के प्रश्न उत्तर

 

वितान ,भाग-2( प्रश्न बैंक )

 



 

 वितान-भाग-2

 पाठ 1, सिल्वर वैडिंग ( मनोहर श्याम जोशी )



प्रश्न 1. यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है, लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों? चर्चा कीजिए। (CBSE-2008, 2010, 2016)

उत्तर: यशोधर बाबू बचपन से ही जिम्मेदारियों के बोझ से लद गए थे। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। उनका पालन-पोषण उनकी विधवा बुआ ने किया। मैट्रिक होने के बाद वे दिल्ली आ गए तथा किशन दा जैसे कुंआरे के पास रहे। इस तरह वे सदैव उन लोगों के साथ रहे जिन्हें कभी परिवार का सुख नहीं मिला। वे सदैव पुराने लोगों के साथ रहे, पले, बढ़े। अत: उन परंपराओं को छोड़ नहीं सकते थे। उन पर किशन दा के सिद्धांतों का बहुत प्रभाव था। इन सब कारणों से यशोधर बाबू समय के साथ बदलने में असफल रहते हैं। दूसरी तरफ, उनकी पत्नी पुराने संस्कारों की थीं। वे एक संयुक्त परिवार में आई थीं जहाँ उन्हें सुखद अनुभव हुआ। उनकी इच्छाएँ अतृप्त रहीं। वे मातृ सुलभ प्रेम के कारण अपनी संतानों का पक्ष लेती हैं और बेटी के अंगु एकपाई पहात हैं। वे बेयों के किसी मामले में दल नाहीं देता। इस प्रकर वे स्वायं को शीघ्र ही बदल लेती है। 

प्रश्न 2. पाठ में ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते/सकती हैं? (CBSE-2009, 2012, 2014)

उत्तर: ‘जो हुआ होगा’ वाक्यांश का प्रयोग किशनदा की मृत्यु के संदर्भ में होता है। यशोधर ने किशनदा के जाति भाई से उनकी मृत्यु का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया- जो हुआ होगा अर्थात् क्या हुआ, पता नहीं। इस वाक्य की अनेक छवियाँ बनती हैं –
पहला अर्थ खुद कहानीकार ने बताया कि पता नहीं, क्या हुआ।
दूसरा अर्थ यह है कि किशनदा अकेले रहे। जीवन के अंतिम क्षणों में भी किसी ने उन्हें नहीं स्वीकारा। इस कारण उनके मन में जीने की इच्छा समाप्त हो गई।
तीसरा अर्थ समाज की मानसिकता है। किशनदा जैसे व्यक्ति का समाज के लिए कोई महत्त्व नहीं है। वे सामाजिक नियमों के विरोध में रहे। फलतः समाज ने भी उन्हें दरकिनार कर दिया।

प्रश्न 3. ‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं? इस काव्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है? (CBSE-2008, 2009, 2011)

उत्तर: यशोधर बाबू ‘समहाउ इंप्रॉपर’ वाक्यांश का प्रयोग तकिया कलाम की तरह करते हैं। उन्हें जब कुछ अनुचित लगता है या किसी में कुछ कमियाँ नजर आती हैं या वे नए के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते तो यह वाक्यांश उनके द्वारा प्रयोग किया जाता है। पाठ में कई स्थान पर "समहाउ इंप्रॉपर" वाक्यांश का प्रयोग हुआ है; जैसे-
दफ़्तर में सिल्वर वैडिंग पर
स्कूटर की सवारी पर
साधारण पुत्र को असाधारण वेतन मिलने पर
अपनों से परायेपन का व्यवहार मिलने पर
डी०डी०ए० फ़्लैट का पैसा न भरने पर
पुत्र द्वारा वेतन पिता को न दिए जाने पर
खुशहाली में रिश्तेदारों की उपेक्षा करने पर
पत्नी के आधुनिक बनने पर
शादी के संबंध में बेटी के निर्णय पर
घर में सिल्वर वैडिंग पार्टी पर
केक काटने की विदेशी परंपरा पर आदि
कहानी के अंत में यशोधर के व्यक्तित्व की यही विशेषता सामने उभरकर आती है कि वे जमाने के हिसाब से अप्रासंगिक हो गए हैं। यह पीढ़ियों के अंतराल को दर्शाता है।

प्रश्न 4. यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान है और कैसे? (CBSE-2012)

उत्तर: मेरे जीवन को दिशा देने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान मेरे गुरुओं का रहा है। उन्होंने हमेशा मुझे यही शिक्षा दी कि सत्य बोलो। सत्य बोलने वाला व्यक्ति हर तरह की परेशानी से मुक्त हो जाता है जबकि झूठ बोलने वाला अपने ही जाल में फँस जाता है। उसे एक झूठ छुपाने के लिए सैकड़ों झूठ बोलने पड़ते हैं। अपने गुरुओं की इस बात को मैंने हमेशा याद रखा। वास्तव में उनकी इसी शिक्षा ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी।

प्रश्न 5. वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं? 

उत्तर: इस कहानी में दर्शाए गए परिवार के स्वरूप व संरचना आज भी लगभग हर परिवार में पाई जाती है। संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त हो रही है। पुरानी पीढ़ी की बातों या सलाह को नयी पीढ़ी सिरे से नकार रही है। नए युवा कुछ नया करना चाहते हैं, परंतु बुजुर्ग परंपराओं के निर्वाह में विश्वास रखते हैं। यशोधर बाबू की तरह आज का मध्यवर्गीय पिता विवश है। वह किसी विषय पर अपना निर्णय नहीं दे सकता। माताएँ बच्चों के समर्थन में खड़ी नजर आती हैं। आज बच्चे अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने में अधिक खुश रहते हैं। वे आधुनिक जीवन शैली को ही सब कुछ मानते हैं। लड़कियाँ फ़ैशन के अनुसार वस्त्र पहनती हैं। यशोधर की लड़की उसी की प्रतिनिधि है। अत: यह कहानी आज लगभग हर परिवार की है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों?
(क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य
(ख) पीढ़ी अंतराल
(ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव।

उत्तर: मेरी समझ में पीढ़ी अंतराल ही ‘सिल्वर वैडिंग’ शीर्षक कहानी की मूल संवेदना है। यशोधर बाबू और उसके पुत्रों में एक पीढ़ी को अंतराल है। इसी कारण यशोधर बाबू अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं। यह सिद्धांत और व्यवहार की लड़ाई है। यशोधर बाबू सिद्धांतवादी हैं तो उनके पुत्र व्यवहारवादी। आज सिद्धांत नहीं व्यावहारिकता चलती है। यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं जो नयी पीढ़ी के साथ कहीं भी तालमेल नहीं रखते। पीढ़ी का अंतराल और उनके विचारों का अंतराल यशोधर बाबू और उनके परिवार के सदस्यों में वैचारिक अलगाव पैदा कर देता है।

प्रश्न 7. अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?

उत्तर: हमारे घर व विद्यालय के आस-पास निम्नलिखित बदलाव हो रहे हैं जिन्हें बुजुर्ग पसंद नहीं करते
युवाओं द्वारा मोबाइल का प्रयोग करना।
युवाओं द्वारा पैदल न चलकर तीव्र गति से चलाते हुए मोटर-साइकिल या स्कूटर का प्रयोग।
लड़कियों द्वारा जीन्स व शर्ट पहनना।
लड़के-लड़कियों की दोस्ती व पार्क में घूमना।
खड़े होकर भोजन करना।
तेज आवाज में संगीत सुनना।
बुजुर्ग पीढ़ी इन सभी परिवर्तनों का विरोध करती है। उन्हें लगता है कि ये हमारी संस्कृति के खिलाफ़ हैं। कुछ सुविधाओं को वे स्वास्थ्य की दृष्टि से खराब मानते हैं तो कुछ उनकी परंपरा को खत्म कर रहे हैं। महिलाओं व लड़कियों को अपनी सभ्यता व संस्कृति के अनुसार आचरण करना चाहिए।

प्रश्न 8. यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए

(क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं है।
(ख) यशोधर बाबू में एक तरह का वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है।
(ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व हैं और नई पीढ़ी द्वारा उनके विचारों को अपनाना ही उचित है।

उत्तर: यशोधर बाबू के बारे में हमारी यही धारणा बनती है कि यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता है पर पुराना छोड़ता नहीं, इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है। यद्यपि वे सिद्धांतवादी हैं तथापि व्यावहारिक पक्ष भी उन्हें अच्छी तरह मालूम है। लेकिन सिद्धांत और व्यवहार के इस द्वंद्व में यशोधर बाबू कुछ भी निर्णय लेने में असमर्थ हैं। उन्हें कई बार तो पत्नी और बच्चों का व्यवहार अच्छा लगता है तो कभी अपने सिद्धांत। इस द्वंद्व के साथ जीने के लिए मजबूर हैं। उनका दफ्तरी जीवन जहाँ सिद्धांतवादी है वहीं पारिवारिक जीवन व्यवहारवादी। दोनों में सामंजस्य बिठा पाना उनके लिए लगभग असंभव है। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है।


          अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर 


प्रश्न 9. किशनदा का बुढ़ापा सुखी क्यों नहीं रहा?

उत्तर: बाल-जती किशनदा का बुढ़ापा सुखी नहीं रहा। उनके तमाम साथियों ने हौजखास, ग्रीनपार्क, कैलाश कहीं-न-कहीं ज़मीन ली, मकान बनवाया, लेकिन उन्होंने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। रिटायर होने के छह महीने बाद जब उन्हें क्वार्टर खाली करना पड़ा तब उनके द्वारा उपकृत लोगों में से एक ने भी उन्हें अपने यहाँ रखने की पेशकश नहीं की। स्वयं यशोधर बाबू उनके सामने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रख पाए क्योंकि उस समय तक उनकी शादी हो चुकी थी और उनके दो कमरों के क्वार्टर में तीन परिवार रहा करते थे। किशनदा कुछ साल राजेंद्र नगर में किराए का क्वार्टर लेकर रहे और फिर अपने गाँव लौट गए जहाँ साल भर बाद उनकी मृत्यु हो गई। विचित्र बात यह है कि उन्हें कोई भी बीमारी नहीं हुई। बस रिटायर होने के बाद मुरझाते-सूखते ही चले गए। अकेलेपन ने उनके अंदर की जीवनशक्ति को समाप्त कर दिया था।

प्रश्न 10. पीढ़ी का अंतराल किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है? स्पष्ट करें।

उत्तर: पीढ़ी का अंतराल आने से विचार नहीं मिलते। युवा लोग पुराने विचारों को ढकोसला, मात्र परंपरा और दकियानूसी मानते हैं। वे तो पुराने विचारों को पूरी तरह त्याग देते हैं। इसीलिए पुराने विचार रखने वाले और कहने वाले उन्हें फालतू आदमी लगते हैं। विचारों को इस मतभेद ने मध्यवर्गीय जीवन को बहुत प्रभावित किया है। मध्यवर्गीय परिवार आज संयुक्त परिवार प्रथा को भूला चुके हैं क्योंकि विचारों का मतभेद वहाँ भी है। यशोधर पंत का जीवन इसी पीढ़ी अंतराल ने प्रभावित किया है। अपने बच्चों के विचारों को वे अपना नहीं सकते और अपने विचारों को वे छोड़ नहीं सकते। अपनाने और छोड़ने की इस दुविधा भरी स्थिति में यशोधर बाबू सपरिवार, होते हुए भी स्वयं को अकेला पाते हैं।

प्रश्न 11. आज पारिवारिक संबंध आर्थिक संबंधों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं, स्पष्ट करें।

उत्तर: विज्ञान के इस युग में आज संबंधों का मानक आर्थिक स्थिति बन गई है। आज पारिवारिक संबंध तभी सही रहते हैं जब आर्थिक स्थिति बेहतर हो। यशोधर पंत की पारिवारिक स्थिति इसी अर्थ पर निर्भर करती है। बच्चे चाहते हैं कि पिता किसी न किसी ढंग से ऊपरी कमाई करें और उनका जीवन सुखी बनाएँ लेकिन सिद्धांतवादी पंत ने ऐसा कभी सोचा भी नहीं। और तो और अपने कोटे का निर्धारित फ्लैट भी उन्होंने नहीं लिया। इन सभी बातों से उनके बच्चे सदा उनसे खिन्न रहे। यद्यपि बड़ा बेटा भूषण एक विज्ञापन एजेंसी में पंद्रह सौ रुपये मासिक की नौकरी करता है तथापि पिता और पुत्र के बीच की वैचारिक खाई बनाने में पैसे की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। कहीं न कहीं पैसा ही इन संबंधों को प्रभावित कर रहा है।

प्रश्न 12. गीता की महिमा सुनते-सुनते जनार्दन शब्द सुनते ही यशोधर पंत क्या सोचने लगते हैं?

उत्तर: गीता की महिमा सुनते-सुनते अचानक यशोधर पंत के कानों में ‘जनार्दन’ शब्द सुनाई पड़ा। यह सुनते ही उन्हें अपने जीजा जनार्दन जोशी की याद आ गई। उन्हें याद आया कि परसों ही चिट्ठी आई है कि उनके जीजा जी बीमार हैं। वे अहमदाबाद में रहते हैं। ऐसे समय में उनका हाल-चाल जानने के लिए अहमदाबाद जाना ही होगा। यशोधर पंत एक मिलनसार व्यक्ति हैं। हर किसी के सुख-दुख में वे जाते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भी पारिवारिकता के प्रति उत्साही बनें। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। पत्नी और बच्चों का तो यह मानना है कि पुराने रिश्तों के प्रति लगाव रखना मूर्खता है? क्योंकि इन्हें निभाने के लिए समय और पैसा दोनों की हानि होती है। अपने जीजा जनार्दन जोशी का हाल-चाल जानने के लिए वे अहमदाबाद जाने के लिए उतावले हैं जब बड़ा बेटा उन्हें पैसे देने से मना कर देता है तो वे उधार पैसे लेकर अहमदाबाद जाने का निर्णय करते हैं।

प्रश्न 13. यशोधर पंत ने भविष्य के बारे में कभी नहीं सोचा, केवल वर्तमान के बारे में ही चिंता की। क्यों ?

उत्तर: सिद्धांतवादी लोग लकीर का फकीर बन जाते हैं। उन्हें भविष्य की कोई फिक्र नहीं होती। वे तो बस वर्तमान को ही सब कुछ मानते हैं। यशोधर पंत भी ऐसे ही व्यक्ति हैं। उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों के इस आग्रह को कई बार ठुकराया कि कोई मकान मोल क्यों न ले लिया जाए। रिटायर होने के बाद तो सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ेगा, लेकिन इस बात को यशोधर बाबू ने कभी समझने का प्रयत्न ही नहीं किया। सदा यही कहते रहे कि जो होगा देखा जाएगा। यशोधर बाबू ने तो किशनदा की एक बात को गाँठ में बाँध लिया है कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं और समझदार लोग उसमें रहते हैं। इसलिए वर्तमान में जीन वाले यशोधर पंत भविष्य की चिंता करता भी तो क्यों?

प्रश्न 14.यशोधर बाबू किशनदा की किन परंपराओं को अभी तक निभा रहे हैं?

उत्तर: यशोधर बाबू किशनदा के भक्त हैं। वे उनके विचारों का अनुसरण करते हैं, जो निम्नलिखित हैं
(क) उन्होंने कभी मकान नहीं लिया क्योंकि किशनदा ने कहा कि मूर्ख मकान बनाते हैं, समझदार उसमें रहते हैं।
(ख) उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा।
(ग) उन्हें हर नई चीज़ में कमी नज़र आती थी।
(घ) वे किशनदा की उस बात को मानते हैं कि जवानी में व्यक्ति गलतियाँ करता है, परंतु बाद में समझदार हो जाता है।
(ङ) वे ‘जन्यो पुन्यू’ के दिन सब कुमाउँनियों को जनेऊ बदलने के लिए अपने घर बुलाते थे, होली गवाते थे तथा रामलीला की तालीम के लिए क्वार्टर का एक कमरा देते थे।

प्रश्न 15. यशोधर बाबू की घर के लोगों से किस-किस बात पर नहीं बनती ?

उत्तर: पिछले कई वर्षों से यशोधर बाबू का अपनी पत्नी और बच्चों से हर छोटी-बड़ी बात में मतभेद होने लगा है। इसी वजह से वह घर जल्दी लौटना पसंद नहीं करते। जब तक बच्चे छोटे थे तब तक वह उनकी पढ़ाई-लिखाई में मदद कर सकते थे। अब बड़ा लड़का एक प्रमुख विज्ञापन संस्था में नौकरी पा गया है। यद्यपि ‘समहाउ’ यशोधर बाबू को अपने साधारण पुत्र को असाधारण वेतन देने वाली यह नौकरी कुछ समझ में आती नहीं।
वह कहते हैं कि डेढ़ हजार रुपया तो हमें अब रिटायरमेंट के पास पहुँच कर मिला है, शुरू में ही डेढ़ हजार रुपया देने वाली इस नौकरी में ज़रूर कुछ पेंच होगा। यशोधर जी का दूसरा बेटा दूसरी बार आई.ए.एस. देने की तैयारी कर रहा है। और यशोधर बाबू के लिए यह समझ सकना असंभव है कि जब यह पिछले साल ‘एलाइड सर्विसेज’ की सूची में, माना काफ़ी नीचे आ गया था, तब इसने ज्वाइन करने से इंकार क्यों कर दिया? उनका तीसरा बेटा स्कॉलरशिप लेकर अमेरिका चला गया है और उनकी एकमात्र बेटी न केवल तमाम प्रस्तावित वर अस्वीकार करती चली जा रही है बल्कि डॉक्टरी की उच्चतम शिक्षा के लिए स्वयं भी अमेरिका चले जाने की धमकी दे रही है। यशोधर बाबू जहाँ बच्चों की इस तरक्की से खुश होते हैं वहा ‘समहाउ’ यह भी अनुभव करते हैं कि वह खुशहाली भी कैसी जो अपनों में परायापन पैदा करे। अपने बच्चों द्वारा गरीब रिश्तेदारों की उपेक्षा उन्हें ‘समहाउ’ हुँचती नहीं।

प्रश्न 16. यशोधर बाबू की पत्नी ने मॉडर्न बनने के पीछे क्या तर्क दिए थे?

उत्तर: यशोधर बाबू की पत्नी अपने मूल संस्कारों से किसी भी तरह आधुनिक नहीं है, परंतु बच्चों की तरफदारी करने की मातृसुलभ मजबूरी ने उन्हें भी मॉडर्न बना डाला है। जिस समय उनकी शादी हुई थी यशोधर बाबू के साथ गाँव से आए ताऊजी और उनके दो विवाहित बेटे भी रहा करते थे। इस संयुक्त परिवार में पीछे ही पीछे बहुओं में गज़ब के तनाव थे लेकिन ताऊजी के डर से कोई कुछ कह नहीं पाता था। यशोधर बाबू की पत्नी को शिकायत है कि संयुक्त परिवार वाले उस दौर में पति ने हमारा पक्ष कभी नहीं लिया, बस जिठानियों की चलने दी। उनका यह भी मानना है कि मुझे आचार-व्यवहार के ऐसे बंधनों में रखा गया मानो मैं जवान औरत नहीं, बुढ़िया थी। जितने भी नियम इनकी बुढ़िया ताई के लिए थे, वे सब मुझ पर भी लागू करवाए – ऐसा कहती है घरवाली बच्चों से। बच्चे उससे सहानुभूति व्यक्त करते हैं। फिर वह यशोधर जी से उन्मुख होकर कहती है-मैं भी इन बातों को उसी हद तक मानूंगी जिस हद तक सुभीता हो। अब मेरे कहने से वह सब ढोंग-ढकोसला हो नहीं सकता।

प्रश्न 17. कहानी के आधार पर सिद्ध कीजिए कि यशोधर बाबू का व्यक्तित्व किशनदा के पूर्ण प्रभाव में विकसित हुआ था।
                               अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ के आधार पर बताइए कि यशोधर बाबू किशनदा को अपना आदर्श क्यों मानते थे?

उत्तर: ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में यशोधर बाबू किशनदा के मानस पुत्र लगते हैं। उनका व्यक्तित्व किशनदा की प्रतिच्छया है। कम उम्र में यशोधर पहाड़ से दिल्ली आ गए थे तथा किशनदा ने ही उन्हें आश्रय दिया था। उन्हें सरकारी विभाग में नौकरी दिलवाई। इस तरह जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वाले व्यक्ति से प्रभावित होना स्वाभाविक है। किशनदा की निम्नलिखित आदतों का यशोधर बाबू ने जीवन भर निर्वाह किया
ऑफिस में सहयोगियों के साथ संबंध
सुबह सैर करने की आदत
पहनने-ओढ़ने का तरीका
किराए के मकान में रहना
आदर्श बातें करना
किसी बात को कहकर मुसकराना
सेवानिवृत्ति के बाद गाँव जाने की बात कहना आदि
यशोधर बाबू ने रामलीला करवाना आदि भी किशनदा से ही सीखा। वे अंत तक अपने सिद्धांतों पर चिपटे रहे। किशनदा के उत्तराधिकारी होते हुए भी उन्होंने परिवार नामक संस्था को बनाया।

प्रश्न 18. ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी का प्रमुख पात्र वर्तमान में रहता है, किंतु अतीत को आदर्श मानता है। इससे उसके व्यवहार में क्या-क्या विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं? सोदाहरण उल्लेख कीजिए। (CBSE-2012)
                                  अथवा
यशोधर पंत की पीढ़ी की विवशता यह है कि वे पुराने को अच्छा समझते हैं और वर्तमान से तालमेल नहीं बिठा पाते। ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए। (CBSE-2012)
                               अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ का प्रधान पात्र वर्तमान में रहता है, किंतु अतीत में जीता है। भविष्य के साथ कदम मिलाने में असमर्थ रहता है। – उपर्युक्त कथन के आलोक में यशोधर बाबू के अंतर्द्वंद्व पर सोदाहरण प्रकाश डालिए। (CBSE-2011)
                               अथवा
‘यशोधर बालू दो भिन्न कालखंडों में जी रहे हैं’-पक्ष या विपक्ष में सोदाहरण तर्क दीजिए। (CBSE-2016)

उत्तर: 'सिल्वर वैडिंग’ का प्रधान पात्र यशोधर बाबू है। वह रहता तो वर्तमान में हैं, परंतु जीता अतीत में है। वह अतीत को आदर्श मानता है। यशोधर को पुरानी जीवन शैली, विचार आदि अच्छे लगते हैं, वे उसका स्वप्न हैं। परंतु वर्तमान जीवन में वे अप्रासंगिक हो गए हैं। कहानी में यशोधर का परिवार नए ज़माने की सोच का है। वे प्रगति के नए आयाम छूना चाहते हैं। उनका रहन-सहन, जीने का तरीका, मूल्यबोध, संयुक्त परिवार के कटु अनुभव, सामूहिकता का अभाव आदि सब नए ज़माने की देन है। यशोधर को यह सब ‘समहाड इम्प्रापर’ लगता है। उन्हें हर नई चीज़ में कमी नजर आती है। वे नए जमाने के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे। वे अधिकांश बदलावों से असंतुष्ट हैं। वे बच्चों की तरक्की पर खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दे पाते। यहाँ तक कि उन्हें बेटे भूषण के अच्छे वेतन में गलती नजर आती है। दरअसल यशोधर बाबू अपने समय से आगे निकल नहीं पाए। उन्हें लगता है कि उनके जमाने की सभी बातें आज भी वैसी ही होनी चाहिए। यह संभव नहीं है। इस तरह के रूढ़िवादी व्यक्ति समाज के हाशिए पर चले जाते हैं।

प्रश्न 19. यशोधर के स्वभाव को ‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के आधार पर बताइए। (CBSE-2010)

                           अथवा

‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर यशोधर बाबू के स्वभाव की किंहीं तीन विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (CBSE-2008, 2009)
                               अथवा
यशोधर पंत की तीन चारित्रिक विशेषताएँ सोदाहरण बताइए। (CBSE-2014)

उत्तर: यशोधर पंत गृह मंत्रालय में सेक्शन अफ़सर हैं। वह पहाड़ से दिल्ली आए थे और यहाँ किशनदा के घर रहे। उनका यशोधर
पर असर था। यशोधर के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
भौतिक सख के विरोधी – यशोधर भौतिक संसाधनों के घोर विरोधी थे। उन्हें घर या दफ्तर में पार्टी करना पसंद नहीं था। वे पैदल चलते थे या साइकिल पर चलते थे। केक काटना, काले बाल करना, मेकअप, धन संग्रह आदि पसंद नहीं था।
असंतुष्ट पिता – यशोधर जी एक असंतुष्ट पिता भी थे। अपने बच्चों के विचारों से सहमत नहीं थे। बेटी के पहनावे को वे सही नहीं मानते थे। उन्हें बच्चों की प्रगति से भी ईष्र्या थी। बेटे उनसे किसी बात में सलाह नहीं लेते थे क्योंकि उन्हें सब कुछ गलत नज़र आता था।
परंपरावादी – यशोधर परंपरा का निर्वाह करते थे। उन्हें सामाजिक रिश्ते निबाहने में आनंद आता था। वे अपनी बहन को नियमित तौर पर पैसा भेजते थे। वे रामलीला आदि का आयोजन करवाते थे।
अपरिवर्तनशील – यशोधर बाबू आदर्शो से चिपके रहे। वे समय के अनुसार अपने विचारों में परिवर्तन नहीं ला सके। वे रूढ़िवादी थे। उन्हें बच्चों के नए प्रयासों पर संदेह रहता था। वे सेक्शन अफ़सर होते हुए भी साइकिल से दफ्तर जाते थे।

प्रश्न 20. यशोधर बाबू किन जीवन-मूल्यों को थामे बैठे हैं? नई पीढ़ी उन्हें प्रासंगिक क्यों नहीं मानती? तर्कसम्मत उत्तर दीजिए। (CBSE-2015)
                                 अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के पात्र किशनदा के उन जीवन-मूल्यों की चर्चा कीजिए जो यशोधर बाबू की सोच में आजीवन बने रहे। (CBSE-2014)
                               अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ के आधार पर उन जीवन-मूल्यों पर विचार कीजिए जो यशोधर बाबू को किशनदी से उत्तराधिकार में मिले थे। आप उनमें से किन्हें अपनाना चाहेंगे? (CBSE-2015)

उत्तर: ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में लेखक ने दो पीढ़ियों के अंतराल को बताया है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि उनकी पत्नी, बच्चे व सहयोगी नई पीढ़ी का। यशोधर बाबू निम्नलिखित जीवनमूल्यों को थामे हुए हैं-
1.सादगी – यशोधर बाबू सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। आधुनिक वस्तुएँ उन्हें पसंद नहीं थी। वे साइकिल पर दफ्तर जाते थे तथा फटा पुलोवर पहनकर दूध लाते थे।
2.परंपराओं से लगाव – उनका अपनी संस्कृति से लगाव था। वे होली जैसे त्योहार पर कार्यक्रम करवाते थे।
3. सामूहिकता – यशोधर बाबू अपनी उन्नति के साथ-साथ रिश्तेदारों, साथियों की उन्नति के बारे में चिंतित रहते थे।
4.त्याग की भावना – यशोधर पंत में त्याग की भावना थी। उन्होंने कभी संग्रह की भावना नहीं अपनाई।
नई पीढ़ी यशोधर पंत के जीवन-मूल्यों को अप्रासंगिक मानती है। उनका लक्ष्य सिर्फ धन कमाना है। वे भौतिक चकाचौंध को ही सब कुछ मानते हैं। इसके अलावा, सामूहिक या संयुक्त परिवार के कष्ट उन्होंने अनुभव किए हैं। उन्हें व्यक्तिगत उन्नति के अवसर नहीं मिलते थे। इन सभी कारणों से नई पीढ़ी पुराने मूल्यों को स्वीकार नहीं करती।

प्रश्न 21. 'सिल्वर वैडिंग’ वर्तमान युग में बदलते जीवन-मूल्यों की कहानी है। सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2014)

उत्तर: ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी वर्तमान युग में बदलते जीवन-मूल्यों की कहानी है। इस कहानी में यशोधर पंत प्राचीन मूल्यों के प्रतीक हैं। उनके विपरीत उनकी संतान नए युग का प्रतिनिधित्व करती है। दोनों पीढ़ियों के अपने-अपने जीवन मूल्य हैं। भूषण व यशोधर की बेटी वर्तमान समय के बदलते जीवन-मूल्यों की झलक दिखलाते हैं। नई पीढ़ी जन्म-दिन, सालगीरह आदि पर केक काटने में विश्वास रखती है। नई पीढ़ी तेज़ी से आगे बढ़ना चाहती है। इसके लिए वे परंपरागत व्यवस्था को छोड़ने में संकोच नहीं करते।
यशोधर बाबू परंपरा से जुड़े हुए हैं। वे सादगी का जीवन जीना चाहते हैं। संग्रह वृत्ति, भौतिक चकाचौंध से दूर, वे आत्मीयता, सामूहिकता के बोध से युक्त हैं। इन सबके कारण वे भौतिक संसाधन नहीं एकत्र कर पाते । फलतः वे घर में ही अप्रासांगिक हो जाते हैं। उनकी पत्नी बाहरी आवरण को बदल पाती है, परंतु मूल संस्कारों को नहीं छोड़ पाती। बच्चों की हठ के सम्मुख वह मॉडर्न बन जाती है। समय परिवर्तनशील होता है। जीवन-मूल्य भी अपने रूप को बदल लेते हैं।

प्रश्न 22. ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में आधुनिक पारिवारिक मूल्यों के विघटन का यथार्थ चित्रण है। उदाहरण देते हुए इस कथन का विवेचन करें।

उत्तर: ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में आधुनिक पारिवारिक मूल्यों के विघटन का यथार्थपरक चित्रण है। यशोधर के परिवार में उनके बेटे, बेटी व पत्नी हैं। ये सभी आधुनिक विचारों के समर्थक हैं। उन्हें यशोधर के आदर्श व मूल्य अप्रासांगिक नज़र आते हैं। बड़ा बेटा भूषण एक प्राइवेट कंपनी में अच्छा वेतन पाता है। दूसरा बेटा आई०ए०एस० की तैयारी कर रहा है। तीसरा बेटा छात्रवृत्ति लेकर अमेरिका गया। बेटी अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है। पत्नी अपने पुराने कष्टों के लिए पति को जिम्मेदार मानती है। यह पीढ़ी मौज-मस्ती में विश्वास रखती है। ये भौतिक संसाधनों को जीवन का अंतिम सत्य मानते हैं। दूसरी तरफ यशोधर बाबू रामलीला करवाने, रिश्तेदारों के मोह, सादगीपूर्ण जीवन, नीरस जीवन आदि मूल्यों में विश्वास रखते हैं। कई जगह वे संतान की प्रगति से ही ईर्ष्या करते हुए दिखाई देते हैं। इन सब कारणों से परिवार उन्हें कोई तवज्जो नहीं देता। इस प्रकार परिवार में तनाव होता है। पारिवारिक मूल्य विघटित होते जाते हैं।

प्रश्न 23.‘यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व हैं और नई पीढ़ी द्वारा उनके विचारों को अपनाना ही उचित है।’-इस कथन के पक्ष-विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए। (CBSE-2008, 2012)

उत्तर: यशोधर बाबू अपने जीवनदर्शन के कारण पुरानी परंपरा के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे जीवनभर अपने सिद्धांतों का पालन करते रहे। उनके व्यक्तित्व पर किशनदा का प्रभाव रहा। यशोधर बाबू ने अपने पद के हिसाब से जीवन जीया। वे सहकर्मियों के साथ मधुर संबंध भी रखते थे। वे सामाजिक व्यक्ति थे। नौकरी में होने के बावजूद वे संयुक्त परिवार को मानते थे। वे सामाजिक रिश्तों को निभाते थे। वे अपनी बहन को नियमित तौर पर पैसा भेजते हैं। बीमार जीजा को देखने जाने के बारे में सोचते हैं। यशोधर बाबू भारतीय संस्कारों को भी अपनाते हैं।
वे अपने घर में कुमाऊँनी परंपरा से संबंधित आयोजनसालोंसाल तक करवाते रहे। उनकी इच्छा थी कि समाज में उन्हें सम्मानित व्यक्ति समझा जाए। वे भौतिक चकाचौंध को गलत समझते थे। उन्हें अप ने बच्चों की प्रगति अच्छी लगती थी, परंतु उनका वैचारिक दायरा बहुत बड़ा नहीं था। वे अपनी आमदनी के अनुरूप खर्च करना चाहते थे। इन गुणों से उन्हें आदर्श व्यक्तित्व माना जा सकता है। नई पीढ़ी को उनके जीवन के प्रमुख तत्वों को आत्मसात करना चाहिए।

प्रश्न 24. यशोधर पंत की आँखों में नमी आने का क्या कारण हो सकता है? यदि भूषण की जगह आप होते और शेष परिस्थितियाँ ठीक कहानी की ही तरह होती तो आपका व्यवहार अपने ‘बब्बा’ के प्रति कैसा होता?

उत्तर: भूषण ने अपने पिता को ऊनी ड्रेसिंग गाउन उपहार स्वरूप दिया ताकि वह दूध लाते समय ठंड से बचा रहे। यह सुनकर पंत की आँखों में नमी आ गई। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं- 
यशोधर को यह बात दिल से लगी। भूषण ने स्वयं दूध लाने की जिम्मेदारी नहीं ली। उसने पिता की सेहत के लिए तथा अपनी प्रतिष्ठा के लिए यह गाउन दिया था।
दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि यशोधर के पथप्रदर्शक किशनदा की मौत दयनीय दशा में हुई। उन्होंने परिवार नहीं बनाया। फलतः किसी ने उनकी देखभाल नहीं की। यशोधर को लगा कि उनकी देखभाल करने वाला परिवार भी है।
यदि भूषण की जगह हम होते तो हम अपने ‘बब्बा’ के प्रति अच्छा व्यवहार करते। उन्हें पूरा सम्मान दिया जाता। उनकी ज़रूरतों का ध्यान रखा जाता।

प्रश्न 25. ‘यशोधर बाबू चाहते हैं कि उन्हें समाज का सम्मानित बुजुर्ग माना जाए, लेकिन जब समाज ही न हो तो यह पद उन्हें क्यों कर मिले?’ यशोधर बाबू का ऐसा चाहना क्या उचित है? उनकी यह सोच आपको कहाँ तक अपील करती है?

उत्तर: यशोधर का स्वयं को सम्मानित करवाने की चाह उचित ही है। इसका कारण यह है कि यशोधर ने सारी उम्र समाज की परंपराओं का निर्वाह किया। व्यक्तिगत सुखों को तिलांजलि दी थी। आदर्श जीवन को जीया। अतः उनका चाहना ठीक है, परंतु आज समाज बदल गया है।
पुरानी पद्धति पर जीवन जीने वाले अप्रासंगिक माने जाने लगे हैं। आदर्श व्यवहार की कसौटी पर असफल हो रहा है। ऐसे माहौल में यशोधर जैसे व्यक्तियों की इच्छा धराशयी हो जाती है। ये लोग समयानुसार अपने में बदलाव नहीं कर पाते और घर में ही अकेले रह जाते।



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         पाठ  2 , जूझ ( डाॅ आनंद यादव )



प्रश्न 1. 'जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है? (CBSE-2009)


उत्तर: शीर्षक किसी भी रचना के मुख्य भाव को व्यक्त करता है। इस पाठ का शीर्षक ‘जूझ’ पूरे अध्याय में व्याप्त है।
‘जूझ’ का अर्थ है-संघर्ष। इसमें कथा नायक आनंद ने पाठशाला जाने के लिए संघर्ष किया। यह एक किशोर के देखे और भोगे हुए गाँवई जीवन के खुरदरे यथार्थ व परिवेश को विश्वसनीय ढंग से व्यक्त करता है। इसके अतिरिक्त, आनंद की माँ भी अपने स्तर पर संघर्ष करती है। लेखक के संघर्ष में उसकी माँ, देसाई सरकार, मराठी व गणित के अध्यापक ने सहयोग दिया। अत: यह शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है। इस कहानी के कथानायक में संघर्ष की प्रवृत्ति है। उसका पिता उसको पाठशाला जाने से मना कर देता है। इसके बावजूद, कथा नायक माँ को पक्ष में करके देसाई सरकार की सहायता लेता है। वह दादा व देसाई सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखता है तथा अपने ऊपर लगे आरोपों का उत्तर देता है। आगे बढ़ने के लिए वह हर कठिन शर्त मानता है। पाठशाला में भी वह नए माहौल में ढलने, कविता रचने आदि के लिए संघर्ष करता है। इस प्रकार यह शीर्षक कथा-नायक की केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है।

प्रश्न 2. स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ? 


उत्तर: लेखक को मराठी का अध्यापक बड़े आनंद के साथ पढ़ाता था। वह भाव छंद और लय के साथ कविताओं का पाठ करता था। बस तभी लेखक के मन में भी यह विचार आया कि क्यों न वह भी कविताएँ लिखना शुरू करें। खेतों में काम करते-करते और भैंसे चराते-चराते उसे बहुत-सा समय मिल जाता था। इस कारण लेखक ने कविताएँ लिखनी आरंभ कर दी और अपनी सारी कविताओं को वह मराठी के अध्यापक को दिखाता था ताकि उसकी कमियों को दूर किया जा सके।

प्रश्न 3. श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई? (CBSE-2009, 2014)


उत्तर: श्री सौंदलगेकर मराठी के अध्यापक थे। लेखक बताता है कि पढ़ाते समय वे स्वयं में रम जाते थे। उनका कविता पढ़ाने का अंदाज बहुत अच्छा था। सुरीला गला, छद की बढ़िया लय-ताल और उसके साथ ही रसिकता थी उनके पास। पुरानी-नयी मराठी कविताओं के साथ-साथ उन्हें अनेक अंग्रेजी कविताएँ भी कंठस्थ थीं। पहले वे एकाध कविता गाकर सुनाते थे-फिर बैठे-बैठे अभिनय के साथ कविता का भाव ग्रहण कराते। उसी भाव की किसी अन्य की कविता भी सुनाकर दिखाते। वे स्वयं भी कविता लिखते थे। याद आई तो वे अपनी भी एकाध कविता यह सब सुनते हुए, अनुभव करते हुए लेखक को अपना भान ही नहीं रहता था। लेखक अपनी आँखें और | प्राणों की सारी शक्ति लगाकर दम रोककर मास्टर के हाव-भाव, ध्वनि, गति आदि पर ध्यान देता था। उससे प्रभावित होकर लेखक भी तुकबंदी करने का प्रयास करता था। अध्यापक लेखक की तुकबंदी का संशोधन करते तथा उसे कविता के लय, छद, अलंकार आदि के बारे में बताते। इन सब कारणों से लेखक के मन में कविताओं के प्रति रुचि जगी।

प्रश्न 4. कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया? (CBSE-2009)


उत्तर: जब लेखक को कविता के प्रति कोई लगाव नहीं था तो उसे अपना अकेलापन काटने को दौड़ता था। इसी अकेलेपन ने उसके मन पर निराशा की छाया डाल दी थी। इसी कारण वह जीवन के प्रति निर्मोही हो गया था। लेकिन जब उसका लगाव कविता के प्रति हुआ तो उसकी धारणा एकदम बदल गई। उसे अकेलापन अब अच्छा लगने लगा था। वह चाहता था कि कोई उसे कविता रचते समय न टोके। वास्तव में कविता के प्रति लगाव होने के बाद लेखक के लिए अकेलापन ज़रूरी हो गया था। इसी अकेलेपन में वह कविताएँ रच सकता था।

प्रश्न 5. आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ताजी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें। (CBSE-2018)


उत्तर: पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था। लेखक का दृष्टिकोण पढ़ाई के प्रति यथार्थवादी था। उसे पता था कि खेती से गुजारा नहीं होने वाला। पढ़ने से उसे कोई-न-कोई नौकरी अवश्य मिल जाएगी और गरीबी दूर हो जाएगी। वह सोचता भी है-पढ़ जाऊँगा तो नौकरी लग जाएगी, चार पैसे हाथ में रहेंगे, विठोबा आण्णा की तरह कुछ धंधा-कारोबार किया जा सकेगा। दत्ता जी राव का रवैया भी सही है। उन्होंने लेखक के पिता को धमकाया तथा लेखक को पाठशाला भिजवाया। यहाँ तक कि खुद खर्चा उठाने तक की धमकी लेखक के पिता को दी। इसके विपरीत, लेखक के पिता का रवैया एकदम अनुचित था। उसकी यह सोच, ‘तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है बालिस्टर नहीं होने वाला है तू”-एकदम प्रतिगामी था। वह खेती के काम को ज्यादा बढ़िया समझता था तथा स्वयं ऐयाशी करने के लिए बच्चे की खेती में झोंकना चाहता था।

प्रश्न 6. दत्ताजी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता? अनुमान लगाएँ।


उत्तर: यदि झूठ का सहारा न लेते तो लेखक अनपढ़ रह जाता और वह जीवनभर खेतों में कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता। उसे सिवाय भैंसे चराने अथवा खेती करने के और कोई काम न होता। वह दिन-भर खेतों पर काम करता और शाम को घर लौट आता। उसका पिता अय्याशी करता रहता। लेखक के सारे सपने टूट जाते। वह अपना जीवन और प्रतिभा ऐसे ही व्यर्थ जाने देता। बिना झूठ का सहारा लिए उसकी प्रतिभा कभी भी न चमक पाती। केवल एक झूठ ने लेखक के जीवन की दिशा ही बदल दी।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर



प्रश्न 7. जूझ’ उपन्यास में लेखक ने क्या संदेश दिया है? क्या लेखक अपने उद्देश्य में सफल रहा है?


उत्तर: इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने यही संदेश देना चाहा है कि व्यक्ति को संघर्षों से जूझते रहना चाहिए। समस्याएँ तो जीवन में आती रहती हैं। इन समस्याओं से भागना नहीं चाहिए बल्कि इनका मुकाबला करना चाहिए। इसके लिए आत्मविश्वास का होना जरूरी है। बिना आत्मविश्वास के व्यक्ति संघर्ष नहीं कर सकता। जो व्यक्ति संघर्ष करता है उसे एक न एक दिन सफलता अवश्य मिलती है। संघर्ष करना तो मानव की नियति है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में जीवनभर संघर्ष करता है। यदि संघर्ष नहीं किया तो मानव जीवन एकाकी एवं नीरस बन जाएगा। इन संघर्षों से जूझ कर व्यक्ति सफलता के ऊँचे शिखर पर पहुँच सकता है। लेखक का जीवन भी बहुत संघर्षशील रहा है। इन संघर्षों से दो चार होकर ही उसने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर लिया। इस तरह हम कह सकते हैं कि लेखक अपना उद्देश्य प्रस्तुत करने में सफल रहा है।

प्रश्न 8. लेखक का पाठशाला में पहला अनुभव कैसा रहा?


उत्तर: लेखक फिर से पाँचवीं कक्षा में जाकर बैठने लगा। वहाँ उसे पुनः नाम लिखवाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। ‘पाँचवीं ना पास’ की टिप्पणी उसके नाम के आगे लिखी हुई थी। पहले दिन गली के दो लड़कों को छोड़कर कोई भी लड़की उसका जानकार नहीं था। लेखक को बहुत बुरा लगा। वह सोचने लगा कि उसे अब उन लड़कों के साथ बैठना पड़ेगा जिन्हें वह मंद बुधि समझता था। उसके साथ के सभी लड़के तो आगे की कक्षाओं में चले गए थे। इसलिए वह कक्षा में स्वयं को बहुत अकेला महसूस कर रहा था।

प्रश्न 9. किस घटना से पता चलता है कि लेखक की माँ उसके मन की पीड़ा समझ रही थी? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए। (CBSE नमूना प्रतिदर्श -2012)


उत्तर: लेखक की इच्छा पढ़ाई जारी रखने की थी, परंतु उसका पिता उसे खेत का काम व पशु चराने का काम कराना चाहता था। इसलिए उसने लेखक की पढ़ाई छुड़वा दी। इस बात से लेखक बहुत परेशान रहता था। उसका मन दिन-रात पढ़ाई जारी रखने की योजनाएँ बनाता रहता था। इसी योजना के अनुसार लेखक ने अपनी माँ से दत्ताजी राव सरकार के घर चलकर उनकी सहायता से अपने पिता को राजी करने की बात कही। माँ ने लेखक का साथ देने की बात को तुरंत स्वीकार कर लिया। वह दत्ताजी राव से जाकर बात भी करती है और पति से इस बात को छिपाने का आग्रह भी करती है। इससे पता चलता है कि वह अपने बेटे के मन की पीड़ा को समझती थी।

प्रश्न 10.जूझ’ शीर्षक कहानी के मुख्य चरित्र की चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है।-स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2012)


उत्तर: शीर्षक किसी रचना का मुख्य आधार होता है। इससे पाठक को विषयवस्तु का बोध होता है। ‘जूझ’ शीर्षक अपने आप में अपनी बात को प्रकट करता है। जूझ’ का अर्थ है- संघर्ष। इस कहानी में लेखक का संघर्ष दिखाया गया है। यह शीर्षक आत्मकथा के मूल स्वर के रूप में सर्वत्र दिखाई देता है। कथानायक को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ा। परिवार, समाज, आर्थिक, विद्यालय आदि हर स्तर पर उसका संघर्ष दिखाई देता है। यह शीर्षक कथानायक के पढ़ाई के प्रति जूझने की भावना को उजागर करता है।

प्रश्न 11. दत्ताजी राव की सहायता के बिना ‘जूझ’ कहानी का ‘मैं’ पात्र वह सब नहीं पा सकता जो उसे मिला। टिप्पणी कीजिए। (CBSE-2008)

                          अथवा

कहानीकार के शिक्षित होने के संघर्ष में दत्ताजी राव देसाई के योगदान को जूझ’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2009, 2014)
उत्तर: लेखक के पिता ने खेत के काम के नाम पर उसका स्कूल जाना बंद कर दिया। उसे लगता था कि उसका बेटा बिगड़ जाएगा। माँ-बेटे के प्रयास असफल हो गए। उनके गाँव में दत्ता साहब सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ति थे। लेखक का पिता उनका दबाव मानता था। माँ-बेटे ने एक झूठ के सहारे दत्ताजी राव से सहायता माँगी। दत्ताजी राव ने पिता को खूब डाँट लगाई तथा उसके कहने पर लेखक का पिता उसे पढ़ाने के लिए तैयार हो जाता है। पाठशाला में लेखक अन्य बच्चों के संपर्क में आकर पढ़ने लगता है। इस प्रकार दत्ता जी राव लेखक के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आए। इनके बिना लेखक की पढ़ाई नहीं हो सकती थी और वह अनपढ़ ही रह जाता।

प्रश्न 12. जूझ’ कहानी में आपको किस पात्र ने सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यों? उसकी किंहीं चार चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (CBSE-2008, 2013)


उत्तर: ‘जूझ’ कहानी में दत्ता जी राव देसाई एक प्रभावशाली चरित्र के रूप में हैं। वे आम लोगों के कष्ट दूर करने की कोशिश भी करते हैं। उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
तर्कशील – दत्ता जी राव तर्क के माहिर हैं। लेखक की पढ़ाई के संबंध में वे लेखक के पिता से तर्क करते हैं। जिसके कारण वह उसे पढ़ाने की मंजूरी देता है।
मददगार – दत्ता जी राव लोगों की मदद करते हैं। वे लेखक की पढ़ाई का खर्च भी उठाने को तैयार हो जाते हैं।
प्रेरक – दत्ता साहब का व्यक्तित्व प्रेरणादायक है। वे अच्छे कार्यों के लिए दूसरों को प्रोत्साहित भी करते हैं। इसी की प्रेरणा से लेखक का पिता बेटे को पढ़ाने को तैयार होता है।
समझदार – दत्ता बेहद सूझबूझ वाले व्यक्ति थे। लेखक उसकी माँ की बात का अर्थ वे शीघे ही समझ जाते हैं। वे लेखक के पिता को बुलाकर उसे समझाते हैं कि वह बेटे की पढ़ाई करवाए। वह माँ-बेटे की बात को भी गुप्त ही रखता है।
प्रश्न 13. ‘जूझ’ कहानी के प्रमुख पात्र को पढ़ना जारी रखने के लिए कैसे जूझना पड़ा और किस उपाय से वह सफल हुआ? (CBSE-2012)
उत्तर: लेखक के पिता उसे पढ़ाना नहीं चाहता था जबकि लेखक व उसकी माँ पिता के रवैये से सहमत नहीं थे। उन्होंने दत्ताजी राव की सहायता से यह कार्य करवाया। लेखक पाठशाला जाना शुरू कर देता है। वहाँ दूसरे लड़कों से उसकी दोस्ती होती है। वह पढ़ने के लिए हर तरह के प्रयास करता है। स्कूल में वर्दी, किताबों आदि की समस्या से उसे दो-चार होना पड़ा। यहीं पर मराठी के अच्छे अध्यापक के प्रभाव से वह कविता भी रचने लगा था। वह खेती के काम के समय भी अपने आसपास के दृश्यों पर कविता बनाने लगा था। उन कविताओं को अपने अध्यापक सौंदलेकर को दिखलाता। यह सब कार्य उसने एक झूठ के सहारे किया अगर वह झूठ न बोलता तो दत्ताजी राव उसके पिता पर दबाव नहीं डालते

प्रश्न 14. ‘जूझ’ कहानी में पिता को मनाने के लिए माँ और दत्ताजी राव की सहायता से एक चाल चली गई है। क्या ऐसा कहना ठीक है? क्यों ? (CBSE-2008)


उत्तर: लेखक का मन पाठशाला जाने के लिए तड़पता है। उसके पिता ने खेती के काम के बहाने उसे स्कूल जाने से रोक दिया। माँ और बेटा पिता को नहीं मना सकते थे। अब उनके पास अंतिम उपाय दत्ताजी राव थे जो गाँव में सर्वाधिक प्रभावशाली थे। माँ और बेटा उनके पास जाकर पिता की शिकायत करते हैं। वे पिता के बारे में झूठ भी बोलते हैं। दत्ताजी राव ने लेखक के पिता को बुलाकर बेटे की पढ़ाई के संबंध में डाँट लगाई तथा उसे स्कूल भेजने का आदेश दिया। पिता ने भी कुछ शर्तों के साथ हामी भर दी। इस तरह लेखक का स्कूल जाना शुरू हो गया। वहाँ वह मित्रों से मिला तथा एक शिक्षक के प्रभाव से कविता भी लिखने लगा। यह सब झूठ के जरिए हुआ। नैतिकता की दृष्टि से यह झूठ गलत था, परंतु वह झूठ भी सही माना जाता है जो कल्याणकारी हो, लेखक की पढ़ाई इस झूठ के बिना नहीं हो सकती थी। आज यह कहानी हमें संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। इस तरह झूठ का सहारा लेने से जीवन व सपनों का विकास होता है जिसके आधार पर नए सृजन समाज के समक्ष आते हैं।

प्रश्न 15.‘जूझ’ कहानी प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच संघर्ष की कहानी है। सिद्ध कीजिए। (CBSE-2011, 2012, 2016)

उत्तर: यह कहानी एक किशोर के देखे और भोगे ग्राम्य जीवन के यथार्थ की गाथा है। इस कहानी में एक किशोर को पिता के तानाशाही रवैये के कारण खेती में लगना पड़ा था। उसका मन पाठशाला के लिए तड़पता था। वह परिस्थितियों से जूझता है। यह एक किशोर को देखे और भोगे गए आँवई जीवन के खुरदरे यथार्थ और परिवेश को विश्वसनीय ढंग से प्रतिबिंबि भी करता है। कथानायक शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई स्तर पर जूझता है। पहले वह घर में संघर्ष करता है, इसके बाद स्कूल में भी उसे पढ़ाई के लिए जूझना पड़ता है। आर्थिक संकट से भी उसे परेशानी उठानी पड़ती है। इन सब संघर्षों के बावजूद वह अपनी पढ़ाई जारी रखता है। वह कविता पाठ करने लगा था। गणित में भी वह अव्वल था। इस कारण सभी उसे आनंद कहने लगे थे। लेखक ने आत्मकथा में अपने जीवन संघर्ष को ही व्यक्त किया है। यह कहानी प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष की कहानी है। कथानायक को अंत में अपने संघर्ष में सफलता मिलती है।

प्रश्न 16. ‘जूझ’ कहानी आधुनिक किशोर-किशोरियों को किन जीवन-मूल्यों की प्रेरणा दे सकती है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2014, 2017)
उत्तर: ‘जूझ’ कहानी में किशोर युवक के संघर्ष को व्यक्त किया गया है। यह संघर्ष आधुनिक युवाओं को प्रेरणा दे सकता है जो निम्नलिखित हैं
दूरदर्शिता – कहानी का नायक ‘आनंदा’ दूरदर्शी है। वह किशोर अवस्था में ही पढ़ाई के महत्त्व को समझ गया था। उसे पता था कि खेती में ज्यादा आमदनी नहीं है। वह नौकरी या व्यवसाय का महत्त्व समझ गया था।
मेहनती – आनंदा बेहद मेहनती था। वह खेत में कठोर मेहनत करता था तथा पढ़ाई में भी वह अव्वल था। यह प्रेरणा नए युवा ले सकते हैं।
संघर्षशीलता – आधुनिक किशोर-किशोरियाँ कम संघर्ष से सफलता अधिक चाहते हैं। आनंदा ने पढ़ाई, खेती, स्कूल, समाज हर जगह प्रतिकूल परिस्थितियाँ होते हुए भी सफलता पाई उसको संघर्ष प्रेरक है।
अभ्यास – आनंदा पढ़ाई में बेहद ध्यान देता था। कविता का अभ्यास वह भैंस की पीठ पर, पत्थर पर, खेतों में हर जगह करता था। गणित में भी वह बेहद होशियार था। नए विद्यार्थी अभ्यास का पाठ ले सकते हैं।

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पाठ  3, अतीत में दबे पाँव ( ओम थानवी)




प्रश्न 1.सिंधु सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था, कैसे? (CBSE-2010, 2012, 2016)

उत्तर: सिंधु-सभ्यता के शहर मुअनजो-दड़ो की व्यवस्था, साधन और नियोजन के विषय में खूब चर्चा हुई है। इस बात से सभी प्रभावित हैं कि वहाँ की अन्न-भंडारण व्यवस्था, जल-निकासी की व्यवस्था अत्यंत विकसित और परिपक्व थी। हर निर्माण बड़ी बुद्धमानी के साथ किया गया था; यह सोचकर कि यदि सिंधु का जल बस्ती तक फैल भी जाए तो कम-से-कम नुकसान हो। इन सारी व्यवस्थाओं के बीच इस सभ्यता की संपन्नता की बात बहुत ही कम हुई है। वस्तुत: इनमें भव्यता का आडंबर है ही नहीं। व्यापारिक व्यवस्थाओं की जानकारी मिलती है, मगर सब कुछ आवश्यकताओं से ही जुड़ा हुआ है, भव्यता का प्रदर्शन कहीं नहीं मिलता। संभवत: वहाँ की लिपि पढ़ ली जाने के बाद इस विषय में अधिक जानकारी मिले।

प्रश्न 2. ‘सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।’ ऐसा क्यों कहा गया? 

उत्तर: सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की। मूर्तियाँ, मृद्-भांडे, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। खुदाई के दौरान जो भी वस्तुएँ मिलीं या फिर जो भी निर्माण शैली के तत्व मिले, उन सभी से यही बात निकलकर आती है कि सिंधु सभ्यता समाज प्रधान थी। यह व्यक्तिगत न होकर सामूहिक थी। इसमें न तो किसी राजा का प्रभाव था और न ही किसी धर्म विशेष का। इतना अवश्य है कि कोई-न-कोई राजा होता होगा लेकिन राजा पर आश्रित यह सभ्यता नहीं थी। इन सभी बातों के आधार पर यह बात कही जा सकती है कि सिंधु सभ्यता का सौंदर्य समाज पोषित था।

प्रश्न 3.पुरातत्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि-“सिंधु सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।”
उत्तर: सिंधु-सभ्यता से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उनमें औजार तो हैं, पर हथियार नहीं हैं। मुअनजो-दड़ो, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु-सभ्यता में हथियार उस तरह नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रासाद मिले हैं, न मंदिर, न राजाओं व महतों की समाधियाँ। मुअनजो-दड़ो से मिला नरेश के सिर का मुकुट भी बहुत छोटा है। इन सबके बावजूद यहाँ ऐसा अनुशासन जरूर था जो नगर-योजना, वास्तु-शिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ़-सफ़ाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं में एकरूपता रखे हुए था। इन आधारों पर विद्वान यह मानते हैं कि यह सभ्यता समझ से अनुशासित सभ्यता थी, न कि ताकत से।

प्रश्न 4. ‘यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आप को कहीं नहीं ले जातीं; वे आकाश की तरफ़ अधूरी रह जाती हैं, लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं उस के पार झाँक रहे हैं।’ इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है? (CBSE-2015)

उत्तर: इस कथन के पीछे लेखक का आशय यही है कि खंडहर होने के बाद भी पायदान बीते इतिहास का पूरा परिचय देते हैं। इतनी ऊँची छत पर स्वयं चढ़कर इतिहास का अनुभव करना एक बढ़िया रोमांच है। सिंधु घाटी की सभ्यता केवल इतिहास नहीं है बल्कि इतिहास के पार की वस्तु है। इतिहास के पार की वस्तु को इन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर ही देखा जा सकता है। ये अधूरे पायदान यही दर्शाते हैं. कि विश्व की दो सबसे प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास कैसा रहा।

प्रश्न 5.टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों को भी दस्तावेज़ होते हैं-इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर:यह सच है कि टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज होते हैं। मुअनजो-दड़ो में प्राप्त खंडहर यह अहसास कराते हैं कि आज से पाँच हजार साल पहले कभी यहाँ बस्ती थी। ये खंडहर उस समय की संस्कृति का परिचय कराते हैं। लेखक कहता है कि इस आदिम शहर के किसी भी मकान की दीवार पर पीठ टिकाकर सुस्ता सकते हैं चाहे वह एक खंडहर ही क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं या शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर बैलगाड़ी की रुन-झुन सुन सकते हैं। इस तरह जीवन के प्रति सजग दृष्टि होने पर पुरातात्विक खंडहर भी जीवन की धड़कन सुना देते हैं। ये एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं जो इतिहास के साथ-साथ उस अनछुए समय को भी हमारे सामने उपस्थित कर देते है।

प्रश्न -6. नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में? तर्क दें। (CBSE-2009)

उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता में नदी, कुएँ, स्नानागार व बेजोड़ निकासी व्यवस्था के अनुसार लेखक इसे ‘जल-संस्कृति’ की संज्ञा देता है। मैं लेखक की बात से पूर्णत: सहमत हूँ। सिंधु-सभ्यता को जल-संस्कृति कहने के समर्थन में निम्नलिखित कारण हैं –

यह सभ्यता नदी के किनारे बसी है। मुअनजो-दड़ो के निकट सिंधु नदी बहती है।यहाँ पीने के पानी के लिए लगभग सात सौ कुएँ मिले हैं। ये कुएँ पानी की बहुतायत सिद्ध करते हैं।मुअनजो-दड़ो में स्नानागार हैं। एक पंक्ति में आठ स्नानागार हैं जिनमें किसी के भी द्वार एक-दूसरे के सामने नहीं खुलते। कुंड में पानी के रिसाव को रोकने के लिए चूने और चिराड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है।जल-निकासी के लिए नालियाँ व नाले बने हुए हैं जो पकी ईटों से बने हैं। ये ईटों से ढँके हुए हैं। आज भी शहरों में जल-निकासी के लिए ऐसी व्यवस्था की जाती है।मकानों में अलग-अलग स्नानागार बने हुए हैं।मुहरों पर उत्कीर्ण पशु शेर, हाथी या गैडा जल-प्रदेशों में ही पाए जाते हैं।

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 प्रश्न 7. 'सिन्धु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था'-टिप्पणी कीजिए


उत्तरः सिंधु घाटी की सभ्यता का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि उस काल के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व अधिक था। सिंधु घाटी की वास्तु कला एवं नगर नियोजन, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मिट्टी के बने बर्तन और उन पर चित्रित मनुष्य, पशु, पक्षी और वनस्पतियाँ बेजोड़ हैं। इसी प्रकार नाना प्रकार के खिलौने, केश विन्यास, आभूषण, सुघड़ अक्षरों वाली लिपि भी उनके सौन्दर्य बोध को व्यक्त करती है। आम जनता के प्रयोग की सुन्दर वस्तुओं में जनता की सुरुचि सम्पन्नता, कलाप्रियता एवं सौन्दर्य बोध व्यक्त होता है।


प्रश्न 8. 'सिंधु घाटी सभ्यता महान किन्तु आडम्बर विहीन थी' इस कथन पर सोदाहरण प्रकाश डालिए उत्तरः सिंधु घाटी सभ्यता साधन सम्पन्न थी किन्तु उसमें आडम्बर नहीं था। स्नान घर, पूजा स्थल, सामुदायिक भवन मुअन-जो-दड़ो नगर की सभ्यता को साधन सम्पन्न बनाते थे। यहाँ खेती, पशुपालन, व्यापार, उद्योग-धंधे सब कुछ होता था किन्तु यहाँ न तो भव्य राजप्रासाद थे, न संत महात्माओं की समाधियाँ और न भव्य राजमुकुट या हथियार। इससे पता चलता है कि मुअन-जो-दड़ो की सभ्यता महान होते हुए भी आडम्बर विहीन थी।


प्रश्न 9. मुअनजोदड़ो की बड़ी बस्ती के बारे में विस्तार से बताइए।

उत्तर: लेखक बताता है कि बड़ी बस्ती के घर बहुत बड़े होते थे। इसी प्रकार इन घरों के आँगन भी बहुत खुले होते थे। इन घरों की दीवारें ऊँची और मोटी होती थीं। जिस आधार पर कहा जा सकता है कि मोटी दीवारों वाले घर दो मंजिले होते होंगे। कुछ दीवारों में छेद भी मिले हैं जो यही संकेत देते हैं कि दूसरी मंजिल को उठाने के लिए शायद शहतीरों के लिए यह जगह छोड़ दी गई होगी। सभी घर पक्की ईंटों के हैं। एक ही आकार की ईंटे इन घरों में लगाई गई हैं। यहाँ पत्थर का प्रयोग ज्यादा नहीं हुआ। कहीं-कहीं नालियों को अनगढ़ पत्थरों से ढक दिया है ताकि गंदगी न फैले। इस प्रकार मुअनजोदड़ो की बड़ी बस्ती निर्माण कला की दृष्टि से संपन्न एवं कुशल थी।


प्रश्न 10. सिंधु घाटी की सभ्यता कैसी थी? तर्क सहित उत्तर दें।

उत्तर: लेखक के मतानुसार सिंधु घाटी की सभ्यता ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी। दूसरे स्थानों पर खुदाई करने से राजतंत्र को प्रदर्शित करने वाले महल धर्म की ताकत दिखाने वाले पूजा स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड मिले हैं जबकि मुअनजोदड़ो की खुदाई के दौरान न तो राजप्रसाद ही मिले और न ही मंदिर। यहाँ किसी राजा अथवा महंत की समाधि भी नहीं मिली। यहाँ जो नरेश की मूर्ति मिली है उनके मुकुट का आकार बहुत छोटा है। इतना छोटा कि इससे छोटे सिरपंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इन लोगों की नावों का आकार भी ज्यादा बड़ा नहीं था। इन आधारों पर कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी की । सभ्यता आडंबर हीन सभ्यता थी। ऐसी सभ्यता जो छोटी होते हुए भी महान थी। जो विश्व की प्राचीनतम संस्कृति थी।

प्रश्न 11. किन आधारों पर कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता में राजतंत्र नहीं था?

उत्तर: मुअनजोदड़ो के अजायबघर में प्रदर्शित चीज़ों में औज़ार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं है। मुअनजोदड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। इस बात को लेकर विद्वान सिंधु सभ्यता में शासन या सामाजिक प्रबंध के तौर-तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ अनुशासन ज़रूर था, पर ताकत के बल पर नहीं। वे मानते हैं कोई सैन्य सत्ता शायद यहाँ न रही हो। मगर कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ़-सफ़ाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं आदि में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था।
दूसरी बात, जो सांस्कृतिक धरातल पर सिंधु घाटी सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है, वह है प्रभुत्व या दिखावे के तेवर का नदारद होना। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर। न राजाओं, महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औज़ार भी। मुअनजोदड़ो के नरेश’ के सिर पर जो ‘मुकुट’ है, शायद उससे छोटे सिरपंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। और तो और, उन लोगों की नावें बनावट में मिस्र की नावों जैसी होते हुए भी आकार में छोटी रहीं। आज के मुहावरे में कह सकते हैं वह ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी।

प्रश्न 12. मुअनजोदड़ो और हड़प्पा के बारे में लेखक क्या बताता है?

उत्तर: मुअनजोदड़ो और हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं, दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। ये सिंधु घाटी सभ्यता के परवर्ती यानी परिपक्व दौर के शहर हैं। खुदाई में और शहर भी मिले हैं। लेकिन मुअनजोदड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। वह सबसे उत्कृष्ट भी है। व्यापक खुदाई यहीं पर संभव हुई। बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें, साजोसामान और खिलौने आदि मिले। सभ्यता का अध्ययन संभव हुआ। उधर सैकड़ों मील दूर हड़प्पा के ज्यादातर साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान विकास की भेंट चढ़ गए।’ मुअनजोदड़ो के बारे में धारणा है कि अपने दौर में वह घाटी की सभ्यता का केंद्र रहा होगा। यानी एक तरह की राजधानी। माना जाता है यह शहर दो सौ हेक्टर क्षेत्र में फैला था। आबादी कोई पचासी हजार थी। जाहिर है, पाँच हजार साल पहले यह आज के ‘महानगर’ की परिभाषा को भी लांघता होगा।

प्रश्न 13. लेखक के मुअनजोदड़ो की नगर योजना की तुलना आज के नगरों से किस प्रकार की है?

उत्तर: नगर नियोजन की मोहनजोदड़ो अनूठी मिसाल है; इस कथन का मतलब आप बड़े चबूतरे से नीचे की तरफ देखते हुए सहज ही भाँप सकते हैं। इमारतें भले खंडहरों में बदल चुकी हों, मगर शहर की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफ़ी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है। लेकिन वह रहन-सहन को नीरस बनाता है। शहरों में नियोजन के नाम पर भी हमें अराजकता ज़्यादा हाथ लगती है। ब्रासीलिया या चंडीगढ़ और इस्लामाबाद ‘ग्रिड’ शैली के शहर हैं जो आधुनिक नगर नियोजन के प्रतिमान ठहराए जाते हैं, लेकिन उनकी बसावट शहर के खुद विकास करने का कितना अवकाश छोड़ती है इस पर बहुत शंका प्रकट की जाती है।

प्रश्न 14. महाकुंड के विषय में बताइए। यहाँ की जल निकासी व्यवस्था कैसी थी?

उत्तर: महाकुंड स्तूप के टीले से नीचे उतरने पर मिलता है। धरोहर के प्रबंधकों ने गली का नाम दैव मार्ग रखा है। माना जाता है कि उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता था। कुंड करीब चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पांत में आठ स्नानघर हैं। इनमें किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता। सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक नमूना है। इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है।
कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है जिसमें सफ़ेद डामर का प्रयोग है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या आनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और ईंटों से ढकी भी हैं।

प्रश्न 15. मुअनजोदड़ो के कृषि उत्पादों तथा उद्योग के विषय में बताइए।

उत्तर: विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज्वार, बाजरा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर, खरबूजे और अंगूर उगाते थे। झाड़ियों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी। कपास को छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा गया है। कपास के बीज तो नहीं, पर सूती कपड़ा मिला है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हज़ार ईसा पूर्व का है जो जॉर्डन में मिला। मुअनजोदड़ो में सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी। रंगाई का एक छोटा कारखाना खुदाई में माधोस्वरूप वत्स को मिला था। छालटी (लिनन) और ऊपन कहते हैं। यहाँ सुमेर से आयात होते थे। शायद सूत उनको निर्यात होता हो। बाद में सिंध से मध्य एशिया और यूरोप को सदियों तक हुआ। प्रसंगवश, मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मोहनजोदड़ो के लिए ‘मेलुहा’ शब्द का संभावित प्रयोग मिलता है।

प्रश्न 16. ‘मुअनजोदड़ो’ के उत्खनन से प्राप्त जानकारियों के आधार पर सिंधु सभ्यता की विशेषताओं पर एक लेख लिखिए। 

उत्तर: ‘मुअनजोदड़ो’ के उत्खनन से प्राप्त जानकारियों के आधार पर सिंधु सभ्यता की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
सिंधु सभ्यता के नगरों की सड़कें समकोण पर काटती थीं। वे खुली व साफ़ थी। यहाँ सामूहिक स्नानागार मिले हैं।‘यहाँ पानी की निकासी की उत्तम व्यवस्था थी, नालियाँ पक्की व ढकी हुई थी।यहाँ खेती व व्यापार के प्रमाण मिले हैं। हर नगर में अनाज भंडार घर की व्यवस्था थी। मुहरों पर उत्कीर्ण कलाकृतियाँ, आभूषण, सुघड़ अक्षरों की लिपि आदि से कलात्मक उत्कृष्टता का पता चलता है। हर नगर में अनाज भंडार घर की व्यवस्था थी।नगर सुनियोजित थे।

प्रश्न 17. पर्यटक मुअनजोदड़ो में क्या-क्या देख सकते हैं? ‘अतीत में दबे पाँव’ पाठ के आधार पर वर्णन कीजिए।

उत्तर:पर्यटक मुअनजोदड़ो में निम्नलिखित चीजें देख सकते हैं
बौद्ध स्तूप – मुअनजोदड़ो में सबसे ऊँचे चबूतरे पर बड़ा बौद्ध स्तूप है। यह स्तूप मुअनजोदड़ो के बिखरने के बाद बना था। 25 फुट ऊँचे चबूतरे पर बना है। इसमें भिक्षुओं के रहने के कमरे भी बने हैं।स्नानागार – यहाँ पर 40 फुट लंबा तथा 25 फुट चौड़ा कुंड बना हुआ है। यह सात फुट गहरा है। कुंड के उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। उत्तर में आठ स्नानागार एक पंक्ति में हैं। इसमें एक तरफ तीन कक्ष हैं।अजायबघर – यहाँ का अजायबघर छोटा ही है। यहाँ काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्भांड, दीये, ताँबे का आईना, दो पाटन वाली चक्की आदि रखे हैं।

प्रश्न 18.‘अतीत में दबे पाँव’ पाठ के आधार पर शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए। 

उत्तर: इस पाठ में लेखक ने मुअनजोदड़ो की यात्रा के समय के अपने अनुभवों के विषय में बताया है। लेखक यहाँ पर पहुँचकर पुराने सुनियोजित शहर की एक-एक चीज का सिलसिलेवार परिचय करवाता है। वह उस सभ्यता के अतीत में झाँककर वहाँ के निवासियों और क्रियाकलापों को अनुभव करता है। यहाँ की सड़कें, नालियाँ, स्तूप, स्नानागार, सभागार, अन्न भंडार, कुएँ, आदि के अलावा मकानों की सुव्यवस्था को देखकर लेखक महसूस करता है कि लोग अब भी वहाँ मौजूद हैं। उसे बैलगाड़ियों की ध्वनि सुनाई देती हैं। रसोई घर की खिड़की से झाँकने पर वहाँ पक रहे भोजन की गंध आती है। लेखक कल्पना करता है कि यदि यह सभ्यता नष्ट न हुई होती तो आज भारत महाशक्ति बन चुका होता। यह शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है।

प्रश्न 19. ‘अतीत में दबे पाँव’ पाठ में सिंधु सभ्यता के सबसे बड़े नगर ‘मुअनजो-दड़ो’ की नगर योजना आज की नगर योजनाओं से किस प्रकार बेहतर थी? उदाहरण देते हुए लिखिए। 

उत्तर: इस पाठ में लेखक के वर्णन से पता चलता है कि सिंधु सभ्यता के सबसे बड़ नगर मुअनजोदड़ो की नगरयोजना अपने आप में अनूठी थी। यह आधुनिक नगरों से भिन्न थी। आजकल के नगरों की योजना में फैलाव की गुंजाइश बहुत कम होती है। एक विस्तार के बाद नगर योजना असफल साबित होती है। ‘मुअनजोदड़ो’ की नगर योजना की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं
यहाँ सड़कें चौड़ी व समकोण पर काटती थी।जल निकासी की व्यवस्था उत्तम थी। मकानों के दरवाजे मुख्य सड़क पर नहीं खुलते थे। सड़क के दोनों ओर ढकी हुई नालियाँ मिलती थीं। हर जगह एक ही प्रकार की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। हर घर में एक स्नानघर होता था। कुएँ पकी हुई एक ही आकार की ईंटों से बने हैं। यह पहली संस्कृति है जो कुएँ खोदकर भूजल तक पहुँची थी।

प्रश्न 20. सिंधु घाटी की सभ्यता को जलसभ्यता कहने का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए बताइए कि वर्तमान में जल संरक्षण क्यों आवश्यक हो गया है?

उत्तर: सिंधु घाटी में जल की व्यवस्था अति उत्तम थी। यहाँ पर कुएँ पकी हुई एक ही आकार की ईंटों से बने हैं। इतिहासकारों का मानना है कि यह सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोदकर भूजल तक पहुँची। यहाँ लगभग सात सौ कुएँ थे। इसके अतिरिक्त स्नानागार की व्यवस्था हर घर में है। पानी के रिसाव को रोकने का उत्तम प्रबंध था। जल निकासी के लिए नालियाँ व नाले बने हुए थे जो ढके हुए थे। इस तरह सिंधु सभ्यता में जल संरक्षण पर उचित ध्यान दिया गया था। वर्तमान समय में पूरी दुनिया में जल संकट का हाहाकार मचा हुआ है। लातूर, राजस्थान आदि क्षेत्रों के संकट से हर कोई परिचित है। जल संकट के प्रमुख कारण जनसंख्या वृधि व अनियोजित जल संरक्षण प्रणाली है। जल की कमी नहीं है, परंतु उसका वितरण सही नहीं है। जल संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय हैं –
पानी को दूषित होने से बचाने के उपाय करने चाहिए। पानी का दुरुपयोग विशेषकर उसका समुचित वितरण करना चाहिए। वर्षा के जल के उचित भंडारण की व्यवस्था हो। अधिकाधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। नदी-नालों, तालाबों को प्रदूषण मुक्त रखना चाहिए।

प्रश्न 21.आधुनिक विकास ने प्राचीन शहरी निर्माण व्यवस्था को हाशिए पर ला दिया है। इससे अनेक सामाजिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। पाठ के आधार पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: आधुनिक शहर ब्रासीलिया, चंडीगढ़, इस्लामाबाद आदि शहर ग्रीड शैली में विकसित किए गए हैं। ये आधुनिक प्रतिमान माने गए हैं, परंतु इन शहरों में स्वयं को विकसित करने की क्षमता नहीं है। ये एकाकीपन को बढ़ावा देते हैं। कंक्रीट के जंगल बन गए हैं, हर तरफ भव्यता दिखाई देती है, तकनीक का कमाल देखकर आम व्यक्ति भ्रमित हो जाता है, परंतु वह सहज जीवन नहीं जी पाता। चमक-चमक में पुराने मूल्यों को भूल जाता है। नियोजन के नाम पर सामाजिकता को नष्ट कर दिया जाता है।
विकसित देश तकनीक, आदि के नाम पर पुराने शहरों की निर्माण पद्धति को पिछड़ापन करार देते हैं। पुराने शहर जल की निकासी, जल प्रबंधन, पर्यावरण व मानवीय संबंधों को देखते हुए विकसित हुए हैं। आज नए तरीके के शहर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के साथ करते हैं। परिणामतः बाढ़, सूखा, तापमान में बढ़ोतरी, प्रदूषण आदि से जूझना पड़ रहा है।

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      पाठ-4, डायरी के पन्ने ( ऐन फ्रैंक) deleted



प्रश्न 1.“यह साठ लाख लोगों की तरफ से बोलनेवाली एक आवाज़ है। एक ऐसी आवाज़, जो किसी संत या कवि की नहीं, बल्कि एक साधारण लड़की की है।” इल्या इहरनबुर्ग की इस टिप्पणी के संदर्भ में ऐन फ्रैंक की डायरी के पठित अंशों पर विचार करें।


उत्तर: यह बात बिलकुल सही है कि यह डायरी नाजियों द्वारा यहूदियों पर किए गए अत्याचारों का खुला दस्तावेज है। इससे हमें द्रवितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों की स्थिति, भय, भूख, आतंक, बीमारी, लाचारी आदि सभी स्थितियों को बहुत करीब से देखने व अनुभव करने को मिलता है। यह एकमात्र ऐसी डायरी है जो उस साधारण-सी लड़की ऐन ने किसी ऐतिहासिक उद्देश्य से नहीं, अपितु अपने एकांत अज्ञातवास में समय बिताने के उद्देश्य से लिखी थी। वह कोई महान संत या कवि नहीं थी, फिर भी उसकी आवाज से हमें यहूदियों का दुख जानने का अवसर प्राप्त होता है। दूसरे विश्व-युद्ध में हिटलर ने यहूदियों को अनगिनत यातनाएँ दीं तथा उन्हें भूमिगत जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया था
डर इतना था कि ये लोग सूटकेस लेकर भी सड़क पर नहीं निकल सकते थे। इन्हें दिन का सूर्य व रात का चंद्रमा देखना भी वर्जित था। इन्हें राशन की कमी रहती थी तथा बिजली का कोटा भी था। ये फटे-पुराने कपड़े और घिसे-पिटे जूतों से काम चलाते थे। ऐन फ्रैंक की डायरी में भय, आतंक, भूख, प्यास, मानवीय संवेदना हवाई हमले का डर, पकड़े जाने का डर, किशोर मन के सपने, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, अकेलेपन की पीड़ा आदि का वर्णन है। इस डायरी में कल्पना का अंश नाममात्र का हो सकता है। इस तरह साधारण लड़की द्वारा रचित हुए भी यहा साठ लखयही लोग की आवाज बना जाता है। अता इत्या हत्यु की यहा टिप्पणी बिलकुल सही है।

प्रश्न 2. “काश, कोई तो होता जो मेरी भावनाओं को गंभीरता से समझ पाता। अफ़सोस, ऐसा व्यक्ति मुझे अब तक नहीं मिला…।” क्या आपको लगता है कि ऐन के इस कथन में उसके डायरी लेखन का कारण छिपा है? (CBSE-2008)


उत्तर: हमें लगता है कि अकेलापन ही ऐन फ्रैंक के डायरी लेखन का कारण बना। यद्यपि वह अपने परिवार और वॉन दंपत्ति के साथ अज्ञातवास में दो वर्षों तक रही लेकिन इस दौरान किसी ने उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं किया। पीटर यद्यपि उससे प्यार करता है लेकिन केवल दोस्त की तरह। जबकि हर किसी की शारीरिक जरूरतें होती हैं लेकिन पीटर उसकी इस ज़रूरत को नहीं समझ सका। माता-पिता और बहन ने भी कभी उसकी भावनाओं को गंभीरता से नहीं। समझी शायद इसी कारण वह डायरी लिखने लगी।

प्रश्न 3. “प्रकृति-प्रदत्त प्रजनन-शक्ति के उपयोग का अधिकार बच्चे पैदा करें या न करें अथवा कितने बच्चे पैदा करें-इसकी स्वतंत्रता स्त्री से छीन कर हमारी विश्व-व्यवस्था ने न सिर्फ स्त्री को व्यक्तित्व-विकास के अनेक अवसरों से वंचित किया है बल्कि जनांधिक्य की समस्या भी पैदा की है।” ऐन की डायरी के 13 जून, 1944 के अंश में व्यक्त विचारों के संदर्भ में इस कथन का औचित्य हूँढ़ें। 


उत्तर: ऐन का मानना है कि पुरुषों ने औरतों पर शुरू में शारीरिक बल, आर्थिक आजादी आदि के आधार पर शासन किया। वे अपनी मर्जी से हर कार्य करते रहे हैं। औरतें अब तक अपनी बेवकूफ़ी के कारण यह अन्याय सहती रही हैं। अब यह स्थिति बदल गई है। शिक्षा, काम और प्रगति ने औरतों को जागरूक किया है। कुछ देशों ने उन्हें बराबरी का हक दिया है। समाज में संवेदनशील पुरुषों व औरतों ने इस अन्याय को गलत माना है। आज औरतें पूर्ण आजादी चाहती हैं।
ऐन चाहती है कि औरतों को पुरुषों की तरह सम्मान दिया जाए, क्योंकि औरत ही मानव-जाति की निरंतरता को बनाए रखने के लिए पीड़ा सहती है। ऐन चाहती है कि औरतों को बच्चे जनने चाहिए क्योंकि प्रकृति ऐसा चाहती है। वह उन मूल्यों व व्यक्तियों की निंदा करती है जो समाज में औरतों को सम्मान नहीं देते। वह स्त्री जीवन के अनुभव को अतुलनीय बताती है। उसके भीतर भविष्य को लेकर आशा व सपने हैं। उसे उम्मीद है कि आगामी सदी में औरतों द्वारा बच्चे पैदा करने वाली स्थिति बदलेगी और उन्हें ज्यादा सम्मान व हक मिलेगा।

प्रश्न 4. “ऐन की डायरी अगर एक ऐतिहासिक दौर का जीवंत दस्तावेज़ है, तो साथ ही उसके निजी सुख-दुख और भावनात्मक उथल-पुथल का भी। इन पृष्ठों में दोनों का फ़र्क मिट गया है।” इस कथन पर विचार करते हुए अपनी सहमति या असहमति तर्कपूर्वक व्यक्त करें। 


उत्तर: ऐन ने जब डायरी लिखी वह बहुत ही कठिन दौर था। उस कठिन दौर में यहूदियों का जीवन बहुत कष्टकारी था। उस भयानक ऐतिहासिक दौर का जीवंत दस्तावेज इस डायरी के द्वारा प्रस्तुत किया है। इसी डायरी में अपने अकेलेपन का चित्रण भी ऐन ने किया है। ऐन ने लिखा कि मुझे कभी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो मेरी भावनाओं को समझ सके। यह बात सिद्ध करती है कि ऐन की डायरी अगर एक ऐतिहासिक दौर का जीवंत दस्तावेज है तो साथ ही उसके निजी सुख-दुख और भावनात्मक उथल-पुथल का प्रामाणिक अंकन भी है।

प्रश्न 5. ऐन ने अपनी डायरी ‘किट्टी’ (एक निर्जीव गुड़िया) को संबोधित चिट्ठी की शक्ल में लिखने की जरूरत क्यों महसूस की होगी? 


उत्तर: ऐन की डायरी से पता चलता है कि वह एक संवेदनशील व अंतर्मुखी लड़की थी। अज्ञातवास में आठ सदस्य रह रहे थे जिनमें वह सबसे छोटी थी। वह तेरह वर्ष की थी। अत: भावनाओं के वेग का सर्वाधिक होना स्वाभ Iाविक है। हालाँकि यहाँ पर उसकी भावनाओं को समझने वाला कोई नहीं है। वह कहती भी है-“काश, कोई तो होता जो मेरी भावनाओं को गंभीरता से समझ पाता। अफ़सोस, ऐसा व्यक्ति अब तक नहीं मिला है, इसलिए तलाश जारी रहेगी।” ऐन खुद को औरों से बेहतर समझती है। पीटर से भी वह खुलकर बात नहीं करती। वह अपनी प्रिय व एकांत की सहयोगिनी गुड़िया से बात करती है तथा चिट्ठी के रूप में अपनी भावनाएँ व्यक्त करती है।

प्रश्न 6. युद्ध के दौरान शहरों का माहौल कैसा हो गया था? सविस्तार लिखें।


उत्तर: ऐन फ्रैंक लिखती है कि युद्ध का नाजायज फायदा डचों ने सबसे ज्यादा उठाया। जो लोग अपनी मोटर साइकिलें या कारें खड़ी करके बाजार में खरीदारी करते थे उनकी गाड़ियाँ चुरा ली जाती थीं। चोरी इतनी अधिक बढ़ गई थी कि लोग अँगूठी तक पहनना छोड़ चुके थे। आठ-दस वर्ष का बच्चा भी खिड़की तोड़कर घर में रखा सामान उठा ले जाता था। लोग पाँच मिनट के लिए भी अपना घर नहीं छोड़ सकते थे क्योंकि इतनी देर में तो उनका सारा घर लूट लिया जाता। चोरी हुए सामान के बारे आए दिन विज्ञापन छपते कि जो यह सामान लौटाएगा उसे इनाम मिलेगा। गलियों और नुक्कड़ों पर लगी बिजली से चलने वाली घड़ियाँ तक लोग उतार ले जाते थे। सार्वजनिक टेलीफ़ोन का कोई भी पुरजा लोगों ने नहीं छोड़ा था।

प्रश्न 7. 19 मार्च, 1943 की चिट्ठी में ऐन ने गिल्डर मुद्रा के बारे में क्या बताया है? इससे क्या परेशानी आ गई थी?


उत्तर: ऐन बताती है कि हज़ार गिल्डर के नोट अवैध मुद्रा घोषित किए जा रहे हैं। यह ब्लैक मार्केट का धंधा करने वालों और उन जैसे लोगों के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। उससे बड़ा संकट उन लोगों का है जो या तो भूमिगत हैं या जो अपने धन का हिसाब-किताब नहीं दे सकते। हज़ार गिल्डर का नोट बदलवाने के लिए आप इस स्थिति में हों कि ये नोट आपके पास आया कैसे और उसका सुबूत भी देना होगा। इन्हें कर अदा करने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है; लेकिन अगले हफ्ते तक ही। पाँच सौ गिल्डर के नोट भी तभी बेकार हो जाएँगे। गिएड एंड कंपनी के पास अभी हजार गिल्डर के कुछ नोट बाकी थे जिनका कोई हिसाब-किताब नहीं था। इन्हें कंपनी ने आगामी वर्षों के लिए अनुमानित कर अदायगी में निपटा दिया है।

प्रश्न 8. ऐन को यह डायरी लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इस डायरी के द्वारा वह क्या कहना चाहती है?


उत्तर: ऐन चाहती थी कि लोग नाजियों के अत्याचारों के बारे में विस्तार से जाने। कही हुई या सुनी हुई बातों का प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ता। यह प्रभाव स्थायी भी नहीं होता। इसलिए उसने इन बातों को लिखने का मन बनाया। ताकि लोग पढ़े सच को जानें और उससे प्रभावित हों। वह लिखी है कि मैं सही बता रही हूँ कि युद्ध के दस साल बाद लोग इससे कितना चकित होंगे जब उन्हें पता चलेगा कि यहूदियों को अज्ञातवास में क्यों जाना पड़ा? यहूदियों पर कितने जुल्म हुए? ये सब बातें बताने के लिए ही ऐन ने डायरी लिखी।

प्रश्न 9. संवाद-योजना की दृष्टि से यह डायरी सर्वथा सफल एवं सार्थक रही है, सिद्ध कीजिए।


उत्तर: यद्यपि डायरी में संवाद-योजना नहीं होती। लेखक या लेखिका केवल आत्मपरक शैली में घटनाओं का क्रम से वर्णन करते हैं। लेकिन ऐन की इस डायरी की संवाद-योजना अनूठी है। 19 मार्च, 1943 को लिखी चिट्ठी में उसने संवाद-योजना का प्रयोग किया है। जब हिटलर घायल सैनिकों से बातचीत कर रहे थे और हालचाल जान रहे थे तब संवाद-योजना का प्रयोग किया गया। प्रस्तुत है इस संवाद-योजना का एक उदाहरण“मेरा नाम हैनरिक शापेल है।” “आप कहाँ जख्मी हुए थे?” “स्नालिनग्राद के पास।” ‘किस किस्म का घाव है यह ?” “दोनों पाँव बर्फ की वजह से गल गए हैं और बाएँ बाजू में हड्डी टूट गई है। इस प्रकार इस डायरी की संक्षिप्त संवादयोजना स्वाभाविक एवं सार्थक बन पड़ी है।

प्रश्न 10. इस डायरी में ऐन के निजी जीवन का चित्रण भी हुआ है, सोदाहरण लिखें।


उत्तर: ऐन फ्रैंक ने न केवल यहूदियों और नाजियों के बारे में लिखा बल्कि अपने बारे में भी लिखा। उसका निजी जीवन इस डायरी में प्रस्तुत हुआ है। ऐन को जीवन में कोई ऐसा मित्र नहीं मिला जो उसे समझ पाता। उसकी तकलीफों को जान पाती। उसकी शारीरिक जरूरतों को पूरा करता। पीटर का प्यार केवल दोस्ती तक रहा उसने भी कभी ऐन को समझने की जरूरत नहीं समझी या फिर वह ऐन की भावनाओं को समझ ही नहीं पाया। एक जवान लड़की अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं के साथ अकेली जीती रही। इसलिए उसने इस पीड़ा का वर्णन अपनी डायरी के कुछ पृष्ठों में किया है और कहा है कि काश ! कोई मेरी भावनाओं को जान पाता।

प्रश्न 11. ऐन ने औरत की महत्ता को कैसे बताया?


उत्तर: ऐन ने ‘मौत के खिलाफ मनुष्य’ नाम की किताब में पढ़ा था कि आमतौर पर युद्ध में लड़ने वाले वीर को जितनी तकलीफ, पीड़ा, बीमारी और यंत्रणा से गुजरना पड़ता है, उससे कहीं अधिक तकलीफें औरतें बच्चे को जन्म देते झेलती हैं और इन सारी तकलीफों से गुजरने के बाद उसे पुरस्कार क्या मिलता है? जब बच्चा जनने के बाद उसका शरीर अपना आकर्षण खो देता है तो उसे एक तरफ धकिया दिया जाता है, उसके बच्चे उसे छोड़ देते हैं और उसका सौंदर्य उससे विदा ले लेता है। औरत ही तो है जो मानव जाति की निरंतरता को बनाए रखने के लिए इतनी तकलीफों से गुजरती है और संघर्ष करती है, बहुत अधिक मज़बूत और बहादुर सिपाहियों से भी ज्यादा मेहनत करके खटती है। वह जितना संघर्ष करती है, उतना तो बड़ी-बड़ी डींगें हाँकने वाले ये सारे सिपाही मिलकर भी नहीं करते।

प्रश्न 12. ऐन की किन बातों से पता चलता है कि आज नारी स्वतंत्र होने लगी है?


उत्तर: ऐन कहती है कि संभवतः पुरुषों ने औरतों पर शुरू से ही इस आधार पर शासन करना शुरू किया कि वे उनकी तुलना। में शारीरिक रूप से ज्यादा सक्षम हैं; पुरुष ही कमाकर लाता है; बच्चे पालता पोसता है; और जो मन में आए, करती है, लेकिन हाल ही में स्थिति बदली है। औरतें अब तक इन सबको सहती चली आ रही थीं, जो कि बेवकूफी ही थी। चूंकि इस प्रथा को जितना अधिक जारी रखा गया, यह उतनी ही गहराई से अपनी जड़े जमाती चली गई। सौभाग्य से, शिक्षा, काम तथा प्रगति ने औरतों की आँखें खोली हैं। कई देशों में तो उन्हें बराबरी का हक दिया जाने लगा है। कई लोगों ने कई औरतों ने और कुछेक पुरुषों ने भी अब इस बात को महसूस किया है कि इतने लंबे अरसे तक इस तरह की वाहियात स्थिति से झेलते जाना गलत ही था। आधुनिक महिलाएँ पूरी तरह स्वतंत्र होने का हक चाहती हैं।

प्रश्न 13. 13 जून, 1944 को क्या खास बात थी? ऐन को क्या-क्या मिला?


उत्तर: इस दिन ऐन का जन्मदिन था। वह पंद्रह वर्ष की हो गई थी। वह बताती है कि उसे काफ़ी उपहार मिले हैं। स्प्रिंगर की पाँच खंडों वाली कलात्मक इतिहास पुस्तक, चढियों का एक सेट, दो बेल्टें, एक रूमाल, दही के दो कटोरे, जैम की शीशी, शहद वाले दो छोटे बिस्किट, मम्मी-पापा की तरफ से वनस्पति विज्ञान की एक किताब, मार्गेट की तरफ से सोने का एक ब्रेसलेट, वान दान परिवार की तरफ से स्टिकर एलबम, डसेल की तरफ से बायोमाल्ट और मीठे मटर, मिएप की तरफ से मिठाई, बेप की तरफ से मिठाई और लिखने के लिए कॉपियाँ और सबसे बड़ी बात मिस्टर कुगलर की तरफ से मारिया तेरेसा नाम की किताब तथा क्रीम से भरे चीज के तीन स्लाइस। पीटर ने पीओनी फूलों का खूबसूरत गुलदस्ता दिया। उसे ये उपहार जुटाने में अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ी, लेकिन वह कुछ और जुटा ही नहीं पाया।

प्रश्न 14. ‘डायरी के पन्ने के आधार पर पीटर (ऐनफ्रैंक का मित्र) के स्वभाव की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। 


उत्तर: ऐन फ्रैंक ने अपने दोस्त पीटर के बारे में जिक्र करती है। पीटर ऐनफ्रैंक को दोस्त की तरह स्नेह करता है। स्वयं ऐन फ्रैंक के शब्दों में, उसका स्नेह दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है।” पीटर अच्छा व भला लड़का है। धर्म के प्रति नफ़रत, खाने के बारे में उसका बातें करना आदि उसे अलग बनाता है। वह ऐन की आपत्तिजनक बातें भी सुन लेता है जिन्हें कहने की वह अपनी मम्मी को भी इजाजत नहीं देता। वह दृढ़ निश्चयी है। वह अपने ऊपर लगे आरोपों को बेबुनियाद साबित करने में लगा हुआ है। वह अंतर्मुखी है। वह अपने जीवन में किसी को हस्तक्षेप नहीं करने देता। वह शांतिप्रिय, सहनशील व बेहद सहज आत्मीय व्यक्ति है।

प्रश्न 15. ‘ऐन की डायरी उसकी निजी भावनात्मक उथल-पुथल का दस्तावेज भी है।’-इस कथन की विवेचना कीजिए। 


उत्तर: ऐन फ्रैंक व उसका परिवार हिटलर की नस्लवादी नीति का शिकार हुआ था। उन्हें दो वर्ष तक गुप्त आवास में छुपे रहना पड़ा था। जब वह गुप्त आवास के लिए गई तो उस समय उसकी आयु तेरह साल ही थी। इतनी कम आयु में उन्हें जीवन के भयानक संकट से गुजरना पड़ा। उनके अस्तित्व पर ही संकट आ गया था। ऐन की संवेदना का विकास छुपने से पहले ही हो चुका था। उसके भीतर अपने व्यक्तित्व की पहचान आदि की उथल-पुथल पहले से चलती रहती थी। वह व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास करती है। ऐन ने गुप्त आवास में जो दो वर्ष बिताए, वे दोनों वर्ष विश्व इतिहास में भी महत्त्वपूर्ण थे। हिटलर की नीतियों ने उनके जीवन को तहस-नहस कर दिया। उनका विकास अवरुद्ध कर दिया। इसलिए उसने अपनी डायरी में युद्ध व राजनीति से जुड़ी बातें बताते हुए निजी जीवन के कष्टदायक क्षणों को भी व्यक्त किया है।

प्रश्न 16. ऐन फ्रैंक की डायरी को एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज क्यों माना जाता है? 


उत्तर: ऐन फ्रैंक की डायरी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। यह डायरी दो साल के अज्ञातवास के दौरान लिखी गई। 12 जून, 1942 को उसके जन्मदिन पर सफ़ेद व लाल कपड़े की जिल्द वाली नोटबुक उसे उपहार के तौर पर मिली थी। तभी से उसने एक गुड़िया किट्टी को संबोधित करके लिखनी शुरू की। तब तक गोपनीय जीवन शुरू नहीं हुआ था। महीने भर के अंदर उन्हें अज्ञातवास झेलना पड़ा। ऐन का डायरी लिखना जारी रहा। उसने आखिरी हिस्सा पहली अगस्त, 1944 को लिखा जिसके बाद वह नाजी पुलिस के हत्थे चढ़ गई। यह डायरी इतिहास के एक सबसे आतंकप्रद और दर्दनाक अध्याय के साक्षात अनुभव का बयान करती है। ऐन फ्रैंक उस दर्द की साक्षात भोक्ता थी। वह संवेदनशील थी। उसकी उम्र आने वाले दूषणों से भी पूरी तरह अछूती थी। इस डायरी में भय, आतंक, भूख, प्यार, मानवीय संवेदनाएँ, प्रेम, घृणा, बढ़ती उम्र की तकलीफें, हवाई हमले के डर, पकड़े जाने का लगातार डर, तेरह साल की उम्र के सपने, कल्पनाएँ, बाहरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाने की पीड़ा, मानसिक और शारीरिक जरूरतें, हँसी-मज़ाक, युद्ध की पीड़ा, अकेलापन सभी कुछ है। यह डायरी यहूदियों पर ढाए गए जुल्मों का एक जीवंत दस्तावेज है।

प्रश्न 17.डायरी के पन्ने पाठ के आधार पर ऐन के व्यक्तित्व की तीन विशेषताओं पर प्रकश डालिए। 


उत्तर:‘डायरी के पन्ने’ पाठ के आधार पर ऐन के व्यक्तित्व की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
बौद्धिक रूप से सक्रिय – ऐन को नस्लवादी नफ़रत के कारण गुप्त आवास में रहना पड़ा। ऐसे एकाकी व भयभीत | समय में भी वह डायरी लिखती रहती थी।संवेदनशील – ऐन संवेदनशील लड़की थी, वह पीटर के साथ अपनी भावनाएँ व्यक्त करती थी। परिवार के हर सदस्य के बारे में वह जो कुछ महसूस करती थी, उसे अपनी डायरी में लिखा।स्त्री की पक्षधर – ऐन स्त्री शिक्षा की पक्षधर थी। वह पुरानी महिलाओं को बेवकूफ कहती है क्योंकि वे पुरुष की कमाई पर आश्रित रहती थी। शिक्षित महिलाओं को सम्मान मिलता हैं।

प्रश्न 18.ऐन ने अपनी डायरी में किट्टी को क्या-क्या जानकारी दी है?’डायरी के पन्ने’ पाठ के आधार पर बताइए। 


उत्तर:ऐन ने अपनी डायरी में निम्नलिखित जानकारियाँ दी हैं
रविवार को दोपहर घटी घटना – लगभग तीन बजे दरवाजे की घंटी बजी। मार्गेट गुस्से में थी क्योंकि पापा को एस०एम०एस० से बुलाए जाने का नोटिस मिला था। हर कोई इस बुलावे का मतलब जानता था।इमारत की जानकारी – ऐन ने किट्टी को पापा के दफ्तर की इमारत की जानकारी दी। इसमें तल मंजिल पर बना बड़ा-सा गोदाम है जो काम करने की जगह और भंडार घर के रूप में इस्तेमाल होता है। गोदाम से सटा एक बाहर का दरवाज़ा है जो दफ्तर का प्रवेश द्वार है।अपने पंद्रहवें जन्म दिन की – 13 जून, 1944 को ऐन का पंद्रहवाँ जन्मदिन था। उसे काफ़ी उपहार मिले। इनमें पुस्तकें, दो बेल्टें एक रुमाल, दही के दो कटोरे, जैम की शीशी, शहद वाले बिस्कुट प्रमुख थे।

प्रश्न 19. डायरी के पन्ने के आधार पर औरतों की शिक्षा और उनके मानवाधिकारों के बारे में ऐन के विचारों को अपने शब्दों में लिखिए। 


अथवा
महिलाओं के अधिकारों और जीवनशैली के बारे में ऐन फ्रैंक के विचारों की समीक्षा जीवन-मूल्यों के आधार पर कीजिए। 
उत्तर: ऐन स्त्री की दशा पर अपनी बेबाक राय व्यक्त करती है। वह स्त्रियों की स्थिति को बहुत अन्याय कहती है। उसका मानना है कि शारीरिक अक्षमता को बहाना बनाकर पुरुषों ने स्त्रियों को घर में बाँध कर रखा है। ऐन इसे बेवकूफी कहती है। वह कहती है कि प्रसव पीड़ा दुनिया की सबसे बड़ी तकलीफ है। इस तकलीफ को भी झेलकर स्त्री मनुष्य जाति को जीवित रखे हुए है। वह स्त्रियों के विरोध व असम्मान करने वाले मूल्यों व मनुष्यों की निंदा करना चाहती है। वह स्त्री जीवन के अनुभव को अतुलनीय बताती है। वह स्त्री को भी सैनिक सम्मान की तरह सम्मानित करना चाहती है। उसके भीतर भविष्य को लेकर सपने हैं कि अगली सदी में स्थिति बदलेगी। बच्चे पैदा करने वाली स्थिति बदलकर औरतों को ज्यादा सम्मान व सराहना प्राप्त होगी। उसके ये विचार परिवर्तनकारी हैं। वह मानवाधिकारों के बारे में भी अपनी आवाज़ उठाती है। उसने वितीय विश्वयुद्ध के दौरान घटी घोर अमानवीय स्थितियों का कुशलतापूर्वक चित्रण किया है।

प्रश्न 20. ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में नारी स्वतंत्रता की जो कल्पना की है, आज उस स्थिति में कितना परिवर्तन आया है। सोदाहरण समझाइए। 


अथवा
ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में स्त्रियों के बारे में क्या कहा है? उसकी समीक्षा करते हुए बताइए कि आज स्थितियों में कितना परिवर्तन आया है? 
उत्तर: ऐन नारी की खराब स्थिति के लिए पुरुषों को ज़िम्मेदार मानती है। उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। औरतों ने बच्चे उत्पन्न करने में जो कष्ट सहा है, वह युद्ध में लड़ने वाले सैनिक से कम नहीं है। औरतों को उनके हिस्से का सम्मान मिलना चाहिए। ऐन औरतों को बच्चे जनने बंद करने के लिए नहीं कहती क्यों कि प्रकृति औरतों से यह कार्य करवाना चाहती है। वह समाज में खूबसूरत व सौंदर्यमयी औरतों के योगदान को बहुत महान मानती है। आज समय बदल चुका है। पूरी दुनिया में शिक्षा का प्रसार बढ़ा है। ग्रामीण स्त्रियों की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है, परंतु शिक्षित व शहरी महिलाओं में स्थिति बेहतर हुई है। उन्हें घर, परिवार, समाज, राष्ट्र व समूह-हर जगह सम्मान मिल रहा है। अब बच्चे पैदा करने का अधिकार नारी के विवेक पर है। अतः ऐन की डायरी में वर्णित स्त्री की दशा की तुलना में भारतीय नारी की स्थिति बहुत अच्छी है।

प्रश्न 21.भारतीय नारी जीवन के संदर्भ में उन जीवन मूल्यों का उल्लेख कीजिए, जो हमें सहज ही प्राप्त होते हैं। पुरुष समाज नारी के योगदान को महत्त्व क्यों नहीं देखा? अपने विचार लिखिए। 


उत्तर: समाज में भारतीय नारी से हमेशा त्याग व ममता की अपेक्षा की जाती है। वह अपने जीवन की सुंदरता की बलि चढ़ाकर बच्चों को जन्म देती है। प्रसव पीड़ा किसी सैनिक की पीड़ा से अधिक होती है। इसके बावजूद उसे सम्मान नहीं मिलता। वह संतान के बेहतर भविष्य के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देती है। पुरुषों ने शारीरिक बल के आधार पर स्त्री को कमज़ोर माना है तथा उस पर शासन किया। वे आय के स्रोतों पर नियंत्रण रखते हैं तथा स्त्रियों का कार्य बच्चे पैदा करके तथा उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करना है। इससे स्त्री का अपमान व्यक्तित्व दबा रह जाता है। बच्चे पैदा करने का निर्णय का अधिकार भी पुरुष का होता है। पुरुष ने अपने हितों की रक्षा की आड़ में स्त्री का शोषण किया है।

प्रश्न 22. ‘डायरी के पन्ने’ युवा लेखिका ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी में किस प्रकार दवितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों के उत्पीड़न को झेला? उसका जीवन किस प्रकार आपको भी डायरी लिखने की प्रेरणा देता है, लिखिए।


उत्तर: ऐन फ्रैंक की डायरी, एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें यहूदियों पर नाजी अत्याचारों को जीवंत वर्णन है। यह डायरी व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों का भी बयान करती है। ऐन व उसके परिवार को दो वर्ष से अधिक समय तक अज्ञातवास बिताना पड़ा। 8 जुलाई, 1942 को ए०एस०एम० से बुलावा आने पर सभी गुप्त रूप से रहने की योजना बनाने लगे। यह उनके जीवन का सबसे कठिन समय था। 9 जुलाई, 1942 को ऐन के पिता के दफ्तर में गोदाम व भंडारगृह के रूप में प्रयुक्त कमरे मिले। इस भवन के नीचे की सीढ़ियों वाले गलियारे से दूसरी मंजिल की ओर जाकर गली में खुलने वाले रास्ते की ओर बने कमरे में ऐन का परिवार रहता था। बिजली कटने के डर से वे अधिक बिजली नहीं खर्च कर सकते थे।

साढ़े चार बजे अँधेरा हो जाता था। दिन में घर के पर्दे हटाकर बाहर नहीं देख सकते थे। रात होने पर ही वे आसपास के पर्दै हटाकर देख सकते थे। दिन में वे उलूल-जलूल हरकतें करके दिन बिताते थे। ऐन ने रात में खिड़की खोलकर बादलों से लुकाछिपी करते हुए चाँद को देखा था। 4 अगस्त, 1944 को वे पकड़े गए तथा 1945 में ऐन की अकाल मृत्यु हो गई। ऐन फ्रैंक का जीवन आम व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में रहने की प्रेरणा देता है। वह हमें अपने अनुभव लिखने की भी प्रेरणा देती है। साथ ही, हर स्थिति में मानसिक संतुलन बनाए रखने का संदेश भी मिलता है।

नोट : उपर्युक्त सामग्री इंटरनेट एवं अन्य  विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है। अतः एक बार अपने स्तर पर तथ्यों की प्रमाणिकता एवं शुद्धता की जाँच अवश्य कर लें।             ************************************