कन्या एक कुंवारी थी
जैसे वो चिंगारी थी
वैसे तेज कटारी थी
लेकिन मन की प्यारी थी
सखियों से बतियाती थी
छोरों से घबराती थीं
मुझसे कुछ शर्माती थी
बस से कॉलेज जाती थी
अंतर मन डिस्क्लोज किया
एक दिन उसे प्रपोज किया
पहले वह नाराज हुई
तबीयत कुछ नासाज हुई
फिर बोली यह ठीक नहीं
अपनी ऐसी लीक नहीं
लिखने पढ़ने के दिन हैं
आगे बढ़ने के दिन हैं
ये बातें फिर कर लेंगे
इश्क मोहब्बत पढ़ लेंगे
अभी न मन को हीट करो
एम ए तो कंप्लीट करो
उसने यूं रेस्पॉन्ड किया
प्रोपोजल पोस्पोन्ड किया
हमसे हिम्मत नहीं हरी
मन में ऊर्जा नई भरी
रात रात भर पढ़पढ़ के
नई इबारत गढ़ गढ़ के
ऐसा सबको शाॅक दिया
मैंने कॉलेज टॉप किया
अब तो मूड सुहाना था
उसने भी मन जाना था
लेकिन राज पुराना था
फिर एक नया बहाना था
जोब करो कोई ढंग की
फिर स्टेटस की नौटंकी
कभी कास्ट का पेज फंसा
कभी बाप को नहीं जंचा
थक कर रोज झमेले में
नौचंदी के मेले में
एक दिन जी कैड़ा करके
कहा उसे यूं जाकर के
जो कह दोगी कर लूंगा
कहो हिमालय चढ़ लूंगा
लेकिन क्लियर बात करो
ऐसे ना जज्बात हरो
या तो तुम अब हां कर दो
या फिर साफ मना कर दो
सुनकर कन्या मौन हुई
हर चालाकी गौण हुई
तभी नया छल कर लाई
आंख में आंसू भर लाई
हिम्मत को कर ढेर गई
प्रण पर आंसू फेर गई
पुनः प्रपोजल बीट हुआ
नखरा नया रिपीट हुआ
थोड़ा सा तो वेट करो
पहले पतला पेट करो
जॉइन कोई जिम कर लो
तोंद जरा सी डिम कर लो
खुशबू सी खिल जाऊंगी
मैं तुमको मिल जाऊंगी
3 साल का वादा कर
निज क्षमता से ज्यादा कर
हीरो जैसी बॉडी से
ड्रेसिंग वाली रोडी से
बेहतर फिजिक बना न लूं
6-6 पैक बना ना लूं
सूरत नहीं दिखाऊंगा
तुझको नहीं सताऊंगा
रात और दिन श्रम करके
खाना पीना कम करके
रूखी सूखी खाकर के
सरपट दौड़ लगा करके
सोने सी काया कर ली
फिर मन में ऊर्जा भरली
उसे ढूंढने निकल पड़ा
मगर प्रेम में खलल पड़ा
चुन्नी बांध पुछल्ले में
किसी और के छल्ले में
वह जूही की कली गई
किसी और की गली गई
शादी करके चली गई
हाय रे किस्मत छली गई
थका थका हारा हारा
मैं बदकिस्मत बेचारा
पल में दुनिया घूम लिया
हर फंदे पर लूम लिया
कभी मिली तो पूछूंगा
अपने आंसू पोंछूगा
क्यों मेरा दिल तोड़ गई
प्यार जता कर छोड़ गई
कुछ दिन बाद दिखाई दी
वह आवाज सुनाई दी
छोड़ा था नौचंदी में
पाई सब्जी मंडी में
कैसा घूमा लूप सुनो
उसका अनुपम रूप सुनो
वह जो एक छरहरी थी
कंचन देह सुनहरी थी
अब दो की महतारी थी
तीजे की तैयारी थी
उलझे उलझे बाल हुए
फूले फूले गाल हुए
इन बेढंगे हालों ने
दिल के फूटे छालों ने
सपनों में विष घोला था
एक हाथ में झोला था
एक हाथ में मूली थी
खुद भी फूली फूली थी
सब सुंदरता लूली थी
आशा फांसी झूली थी
विधिना के यह खेल कड़े
देख रहा था खड़े-खड़े
तभी अचानक सधे हुए
दो बच्चों से लदे हुए
चिक चिक से कुछ थके हुए
बाल-वाल सब पके हुए
एक अंकल जी प्रकट हुए
दर्शन कितने विकट हुए
एक अंकल जी प्रकट हुए
दर्शन कितने विकट हुए
52 इंची कमरा था
इसी कली का भ्रमरा था
तूफानों ने पाला था
मुझसे ज्यादा काला था
मुझसे अधिक उदास था वो
केवल 10वीं पास था वो
रानी साथ मदारी के
फूटे भाग बिचारी के
घूरे मेला लूट गए
तितली के पर टूट गए
रचा स्वयंवर वीरों का
मंडप मांडा जीरो का
गरम तवे पर फैल गई
किस खूसट के गैल गई
बिना मिले वापस आया
कई दिनों तक पछताया
अब भी अक्सर रातों में
कुछ गहरे जज्बातों में
पिछली यादें ढोता हूं
सबसे छुपकर रोता हूं
मुझ में क्या कम था ईश्वर
किस्मत में क्या गम था ईश्वर
अब भी आंसू बहते हैं
भाग्य इसी को कहते हैं
कवि - चिराग जैन
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