Saturday, November 9, 2024

हास्य कविता

 कन्या एक कुंवारी थी 

जैसे वो चिंगारी थी

वैसे तेज कटारी थी

लेकिन मन की प्यारी थी 


सखियों से बतियाती थी

छोरों से घबराती थीं 

मुझसे कुछ शर्माती थी 

बस से कॉलेज जाती थी 

अंतर मन डिस्क्लोज किया 

एक दिन उसे प्रपोज किया 

पहले वह नाराज हुई 

तबीयत कुछ नासाज हुई 

फिर बोली यह ठीक नहीं

अपनी ऐसी लीक नहीं 

लिखने पढ़ने के दिन हैं 

आगे बढ़ने के दिन हैं 

ये बातें फिर कर लेंगे 

इश्क मोहब्बत पढ़ लेंगे

अभी न मन को हीट करो 

एम ए तो कंप्लीट करो

उसने यूं रेस्पॉन्ड किया 

प्रोपोजल पोस्पोन्ड किया 

हमसे हिम्मत नहीं हरी

मन में ऊर्जा नई भरी

रात रात भर पढ़पढ़ के 

नई इबारत गढ़ गढ़  के 

ऐसा सबको शाॅक दिया 

मैंने कॉलेज टॉप किया 

अब तो मूड सुहाना था 

उसने भी मन जाना था 

लेकिन राज पुराना था 

फिर एक नया बहाना था 


जोब करो कोई ढंग की 

फिर स्टेटस की नौटंकी 

कभी कास्ट का पेज फंसा

कभी बाप को नहीं जंचा

थक कर रोज झमेले में

नौचंदी के मेले में 

एक दिन जी कैड़ा करके 

कहा उसे यूं जाकर के

जो कह दोगी कर लूंगा 

 कहो हिमालय चढ़ लूंगा 

लेकिन क्लियर बात करो 

ऐसे ना जज्बात हरो

या तो तुम अब हां कर दो 

या फिर साफ मना कर दो 


सुनकर कन्या मौन हुई 

हर चालाकी गौण हुई 

तभी नया छल कर लाई 

आंख में आंसू भर लाई 

हिम्मत को कर ढेर गई 

प्रण पर आंसू फेर गई 


पुनः प्रपोजल बीट हुआ 

नखरा नया रिपीट हुआ 

थोड़ा सा तो वेट करो 

पहले पतला पेट करो 

जॉइन कोई जिम कर लो 

तोंद जरा सी डिम कर लो 

खुशबू सी खिल जाऊंगी 

मैं तुमको मिल जाऊंगी 


3 साल का वादा कर 

निज क्षमता से ज्यादा कर 

हीरो जैसी बॉडी से 

ड्रेसिंग वाली रोडी से 

बेहतर फिजिक बना न लूं 

6-6 पैक बना ना लूं 

सूरत नहीं दिखाऊंगा 

तुझको नहीं सताऊंगा

रात और दिन श्रम करके 

खाना पीना कम करके

रूखी सूखी खाकर के

सरपट दौड़ लगा करके 

सोने सी  काया कर ली

फिर मन में ऊर्जा भरली 

उसे ढूंढने निकल पड़ा 

मगर प्रेम में खलल पड़ा 

चुन्नी बांध पुछल्ले में 

किसी और के छल्ले में 


वह जूही की कली गई 

किसी और की गली गई 

शादी करके चली गई 

हाय रे किस्मत छली गई 


थका थका  हारा हारा

मैं बदकिस्मत बेचारा 

पल में दुनिया घूम लिया 

हर फंदे पर लूम लिया 

कभी मिली तो पूछूंगा 

अपने आंसू पोंछूगा

क्यों मेरा दिल तोड़ गई 

प्यार जता कर छोड़ गई




कुछ दिन बाद दिखाई दी 

वह आवाज सुनाई दी 

छोड़ा था नौचंदी में 

पाई सब्जी मंडी में

कैसा घूमा लूप सुनो 

उसका अनुपम रूप सुनो

वह जो एक छरहरी थी 

कंचन देह सुनहरी थी 

अब दो की महतारी थी 

तीजे की तैयारी थी 


उलझे उलझे बाल हुए 

फूले फूले गाल हुए

इन बेढंगे हालों ने 

दिल के फूटे छालों ने

सपनों में विष घोला था

एक हाथ में झोला था 

एक हाथ में मूली थी 

खुद भी फूली फूली थी

सब सुंदरता लूली थी 

आशा फांसी झूली थी 

विधिना के यह खेल कड़े 

देख रहा था खड़े-खड़े 


तभी अचानक सधे हुए 

दो बच्चों से लदे हुए 

चिक चिक से कुछ थके हुए 

बाल-वाल सब पके हुए

एक अंकल जी प्रकट हुए 

दर्शन कितने विकट हुए


एक अंकल जी प्रकट हुए 

दर्शन कितने विकट हुए

52 इंची कमरा था 

इसी कली का भ्रमरा था 

तूफानों ने पाला था 

मुझसे ज्यादा काला था


मुझसे अधिक उदास था वो 

केवल 10वीं पास था वो

रानी साथ मदारी के 

फूटे भाग बिचारी के 


घूरे मेला लूट गए 

तितली के पर टूट गए 

रचा स्वयंवर वीरों का 

मंडप मांडा जीरो का 

गरम तवे पर फैल गई 

किस खूसट के गैल गई

बिना मिले वापस आया 

कई दिनों तक पछताया

अब भी अक्सर रातों में 

कुछ गहरे जज्बातों में 

पिछली यादें ढोता हूं 

सबसे छुपकर रोता हूं

मुझ में क्या कम था ईश्वर 

किस्मत में क्या गम था ईश्वर 

अब भी आंसू बहते हैं 

भाग्य इसी को कहते हैं


कवि - चिराग जैन


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