Wednesday, November 20, 2024

आरोह भाग 2 गद्य पाठों के प्रश्न उत्तर

 

हिंदी (केंद्रिक) प्रश्न बैंक कक्षा-12


प्रश्न 1.कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।

उत्तर:कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में अद्भुत तालमेल था। ढोल बजते ही लुट्टन की रगों में खून दौड़ने लगता था। उसे हर थाप में नए दाँव-पेंच सुनाई पड़ते थे। ढोल की आवाज उसे साहस प्रदान करती थी। ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में निम्नलिखित तालमेल था-

धाक-धिना, तिरकट तिना – दाँव काटो, बाहर हो जाओ।चटाक्र-चट्-धा – उठा पटक दे।धिना-धिना, धिक-धिना — चित करो, चित करो।ढाक्र-ढिना – वाह पट्ठे।चट्-गिड-धा – मत डरना। ये ध्वन्यात्मक शब्द हमारे मन में उत्साह का संचार करते हैं।


प्रश्न 2. कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए? 

उत्तर: लुट्टन पहलवान का जीवन उतार-चढ़ावों से भरपूर रहा। जीवन के हर दुख-सुख से उसे दो-चार होना पड़ा। सबसे पहले उसने चाँद सिंह पहलवान को हराकरे राजकीय पहलवान का दर्जा प्राप्त किया। फिर काला खाँ को भी परास्त कर अपनी धाक आसपास के गाँवों में स्थापित कर ली। वह पंद्रह वर्षों तक अजेय पहलवान रहा। अपने दोनों बेटों को भी उसने राजाश्रित पहलवान बना दिया। राजा के मरते ही उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। विलायत से राजकुमार ने आते ही पहलवान और उसके दोनों बेटों को राजदरबार से अवकाश दे दिए। गाँव में फैली बीमारी के कारण एक दिन दोनों बेटे चल बसे। एक दिन पहलवान भी चल बसा और उसकी लाश को सियारों ने खा लिया। इस प्रकार दूसरों को जीवन संदेश देने वाला पहलवान स्वयं खामोश हो गया।

प्रश्न 3. लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है? 

उत्तर: पहलवान ने ढोल को अपना गुरु माना और एकलव्य की भाँति हमेशा उसी की आज्ञा का अनुकरण करता रहा। ढोल को ही उसने अपने बेटों का गुरु बनाकर शिक्षा दी कि सदा इसको मान देना। ढोल लेकर ही वह राज-दरबार से रुखसत हुआ। ढोल बजा-बजाकर ही उसने अपने अखाड़े में बच्चों-लड़कों को शिक्षा दी, कुश्ती के गुर सिखाए। ढोल से ही उसने गाँव वालों को भीषण दुख में भी संजीवनी शक्ति प्रदान की थी। ढोल के सहारे ही बेटों की मृत्यु का दुख पाँच दिन तक दिलेरी से सहन किया और अंत में वह भी मर गया। यह सब देखकर लगता है कि उसका ढोल उसके जीवन का संबल, जीवन-साथी ही था।


प्रश्न 4. गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा? 

उत्तर: ढोलक की आवाज़ सुनकर लोगों में जीने की इच्छा जाग उठती थी। पहलवान नहीं चाहता था कि उसके गाँव का कोई आदमी अपने संबंधी की मौत पर मायूस हो जाए। इसलिए वह ढोल बजाता रहा। वास्तव में ढोल बजाकर पहलवान ने अन्य ग्रामीणों को जीने की कला सिखाई। साथ ही अपने बेटों की अकाल मृत्यु के दुख को भी वह कम करना चाहता था।


प्रश्न 5. ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था। 

अथवा

पहलवान की ढोलक की उठती गिरती आवाज़ बीमारी से दम तोड़ रहे ग्रामवासियों में संजीवनी का संचार कैसे करती है? 

उत्तरः महामारी की त्रासदी से जूझते हुए ग्रामीणों को ढोलक की आवाज संजीवनी शक्ति की तरह मौत से लड़ने की प्रेरणा देती थी। यह आवाज बूढ़े-बच्चों व जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य उपस्थित कर देती थी। उनकी स्पंदन शक्ति से शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। ठीक है कि ढोलक की आवाज में बुखार को दूर करने की ताकत न थी, पर उसे सुनकर मरते हुए प्राणियों को अपनी आँखें मूंदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी। उस समय वे मृत्यु से नहीं डरते थे। इस प्रकार ढोलक की आवाज गाँव वालों को मृत्यु से लड़ने की प्रेरणा देती थी।


प्रश्न 6. महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था? 

उत्तर: महामारी ने सारे गाँव को बुरी तरह से प्रभावित किया था। लोग सुर्योदय होते ही अपने मृत संबंधियों की लाशें उठाकर गाँव के श्मशान की ओर जाते थे ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। सूर्यास्त होते ही सारे गाँव में मातम छा जाता था। किसी न किसी बच्चे, बूढ़े अथवा जवान के मरने की खबर आग की तरह फैल जाती थी। सारा गाँव श्मशान घाट बन चुका था।


प्रश्न 7. कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था।

(क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है?

(ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?

(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?

उत्तर:(क) कुश्ती या दंगल पहले लोगों व राजाओं के प्रिय शौक हुआ करते थे। राजा पहलवानों को सम्मान देते थे, परंतु आज स्थिति बदल गई है। अब पहले की तरह राजा नहीं रहे। दूसरे, मनोरंजन के अनेक साधन प्रचलित हो गए हैं।

(ख) कुश्ती की जगह अब अनेक आधुनिक खेल प्रचलन में हैं; जैसे-क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, टेनिस, शतरंज, फुटबॉल आदि।

(ग) कुश्ती को फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर कुश्ती की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा सकती साथ-साथ पहलवानों को उचित प्रशिक्षण तथा कुश्ती को बढ़ावा देने हेतु मीडिया का सहयोग लिया जा सकता है।

प्रश्न 8. आशय स्पष्ट करें आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।

उत्तर: लेखक ने इस कहानी में कई जगह प्रकृति का मानवीकरण किया है। यह गद्यांश भी प्रकृति का मानवीकरण ही है। यहाँ लेखक के कहने का आशय है कि जब सारा गाँव मातम और सिसकियों में डूबा हुआ था तो आकाश के तारे भी गाँव की दुर्दशा पर आँसू बहाते प्रतीत होते हैं। क्योंकि आकाश में चारों ओर निस्तब्धता छाई हुई थी। यदि कोई तारा अपने मंडल से टूटकर पृथ्वी पर फैले दुख को बाँटने आता भी था तो वह रास्ते में विलीन (नष्ट) हो जाता था। अर्थात् वह पृथ्वी तक पहुँच नहीं पाता था। अन्य सभी तारे उसकी इस भावना को नहीं समझते थे। वे तो केवल उसका मजाक उड़ाते थे और उस पर हँस देते थे।

प्रश्न 9. पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:मानवीकरण के अंश- 

अंधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।

आशय-रात का मानवीकरण किया गया है। ठंड में ओस रात के आँसू जैसे प्रतीत होते हैं। वे ऐसे लगते हैं मानो गाँव वालों की पीड़ा पर रात आँसू बहा रही है।तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे। आशय-तारों को हँसते हुए दिखाकर उनका मानवीकरण किया गया है। वे मजाक उड़ाते प्रतीत होते हैं।ढोलक लुढ़की पड़ी थी। आशय-यहाँ पहलवान की मृत्यु का वर्णन है। पहलवान व ढोलक का गहरा संबंध है। ढोलक का बजना पहलवान के जीवन का पर्याय है।

प्रश्न 10. क्या यह कहानी रेणु’ को आंचलिक कहानीकार बनाती है?

उत्तर: यह कहानी निर्विवाद रूप से रेणु’ को आंचलिक कहानीकार बना देती है। ग्रामीण अंचल का इतना यथार्थ और मार्मिक चित्रण पहले शायद नहीं हुआ। ग्रामीण लोक कलाएँ किस तरह विलुप्त होती जा रही हैं इसका चित्रण उन्होंने किया है। यह कहानी पुरानी सत्तात्मक व्यवस्था के टूटने के साथ-साथ लोक कलाओं में आ रही रुकावट का चित्रण करती है। बदलते ग्रामीण परिवेश का यथार्थ अंकन करती यह कहानी रेणु’ को आंचलिक कहानीकारों की श्रेणी में खड़ा कर देती है।


प्रश्न 11. लुट्टन पहलवान की पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में लिखिए।

उत्तर:लुट्टन के माता-पिता की मृत्यु नौ साल में ही हो चुकी थी। उसकी शादी हो चुकी थी। उसकी विधवा सास ने उसे पाला और पोसा। वह अपनी सास के यहाँ कसरत करते-करते बड़ा हो गया। इसी कारण वह पहलवानी में जोर आजमाइश करने लगा।


प्रश्न 12. गाँव में फैली बीमारी से उत्पन्न गाँव की दशा का चित्रण कहानीकार ने किस प्रकार किया है? 

उत्तर: गाँव में महामारी ने पाँव पसार लिए थे। चारों ओर मौत का भयानक तांडव फैला था। रेणु’ लिखते हैं कि सियारों का क्रंदन और चेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी। गाँव की झोपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़ ‘हरे राम, हे भगवान! की टेर अवश्य सुनाई पड़ती थी। बच्चे कभी-कभी निर्बल कंठों से माँ-माँ पुकारकर रो पड़ते थे।


प्रश्न 13. जब मैनेजर और सिपाहियों ने लुट्टन पहलवान को चाँद सिंह से लड़ने से मना कर दिया तो लुट्टन ने क्या कहा?

उत्तर: मैनेजर और सिपाहियों की बातें सुनकर लुट्न सिंह गिड़गिड़ाने लगा। वह राजा साहब के सामने जा खड़ा हुआ। उसने कहा दुहाई सरकार, पत्थर पर माथा पटककर मर जाऊँगा लेकिन लडूंगा अवश्य सरकार, वह कहने लगा-लड़ेंगे सरकार हुकुम हो सरकार।


प्रश्न 14. कहानी की संवाद योजना कैसी है? बताइए।

उत्तर:फणीश्वर नाथ रेणु’ की सभी कहानियों में संवाद योजना देखते ही बनती है। उनकी संवाद योजना चुस्त, सार्थक और प्रभाव उत्पन्न करने वाली है। संवादों के माध्यम से कहानीकार ने पात्रों की मानसिक और चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कर दिया है। लुट्न पहलवान की मन:स्थिति का अंकन निम्न संवाद में हुआ है“दुकानदारों को चुहल करने की सूझती। हलवाई अपनी दुकान पर बुलाता-“पहलवान काका। ताजा रसगुल्ला बना है, जरा नाश्ता कर लो पहलवान बच्चों की-सी स्वाभाविक हँसी हँसकर कहता “अरे तनी मनी काहे। ले आव डेढ़ सेर और बैठ जाता” राजा साहब की विशेषता का उल्लेख इस संवाद में हुआ है।” राजा साहब दस रुपए का नोट देकर कहने लगे-जाओ मेला देखकर घर जाओ… “नहीं, सरकार लड़ेंगे हुकुम हो सरकार।


प्रश्न 15.‘पहलवान की ढोलक’ कहानी के संदेश को स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर: ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में व्यवस्था के बदलने के साथ लोककला व इसके कलाकार के अप्रासांगिक हो जाने की कहानी है। राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आकर जम जाना सिर्फ व्यक्तिगत सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि जमीनी पुरानी व्यवस्था के पूरी तरह उलट जाने और उस पर सभ्यता के नाम पर एक दम नयी व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है। यह ‘भारत’ पर ‘इंडिया’ के छा जाने की समस्या है जो लुट्टन पहलवान को लोक कलाकर के आसन से उठाकर पेट भरने के लिए हायतौबा करने वाली निरीहता की भूमि पर पटक देती है।


प्रश्न 16. राजा साहब ने लुट्टन को क्यों सहारा दिया था? अंत में उसकी दुर्गति होने का क्या कारण था? 

अथवा

पहलवान लुट्टन सिंह को राजा साहब की कृपादृष्टि कब प्राप्त हुई ? वह उन सुविधाओं से वंचित कैसे हो गया? 

उत्तर: लुट्टन ने बचपन से ही कुश्ती सीखी। उसने चाँद पहलवान को हरा दिया। श्यामनगर के मेले के दंगल में उसने यह चमत्कार दिखाया। राजा साहब ने उसे आश्रय दिया। इसके बाद उसने सभी नामी पहलवानों को हरा दिया। अब वह दर्शनीय जीव बन गया था। पंद्रह साल तक वह राजदरबार में रहा। उसने दोनों बेटों को भी पहलवानी में उतारा। राजा साहब के मरने के बाद नए राजा को घुड़सवारी में रुचि थी। उसने पहलवान व उसके बेटों को राजदरबार से निकाल दिया। अब वह गाँव आकर रहने लगा। यहाँ उसे भोजन भी मुश्किल से मिलना था। महामारी ने उसके बेटों को लील लिया। उनके चार-पाँच दिन बाद वह भी मर गया।


प्रश्न 17. लुट्टन से राज पहलवान लुट्टन सिंह बन जाने के बाद की दिनचर्या पर प्रकाश डालिए।

अथवा

पहलवान लुट्टन के सुख-चैन भरे दिनों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। 

उत्तर: लुट्टन की कीर्ति राज पहलवान बन जाने के बाद दूर-दूर तक फैल गई। राजा ने उसे दरबार में रखा। पौष्टिक भोजन व राजा की स्नेह दृष्टि से उसने सभी नामी पहलवानों को हरा दिया। वह दर्शनीय जीव बन गया। मेलों में वह घुटने तक लंबा चोगा पहनकर अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह चलता था। हलवाई उसे मिठाई खिलाते थे।


प्रश्न 18.‘पहलवान की ढोलक’ कहानी के आधार पर बताइए कि महामारी फैलने पर चिकित्सा और देखरेख के अभाव में ग्रामीणों की दशा कैसी हो जाती थी। पहलवान की ढोलक उनकी सहायता किस प्रकार करती थी? 

उत्तर: महामारी फैलने पर गाँव में चिकित्सा और देखरेख के अभाव में ग्रामीणों की दशा दयनीय हो जाती थी। लोग दिन भर खाँसते कराहते रहते थे। रोज दो-चार व्यक्ति मरते थे। दवाओं के अभाव में उनकी मृत्यु निश्चित थी। शरीर में शक्ति नहीं रहती थी। पहलवान की ढोलक मृतप्राय शरीरों में आशा व जीवंतता भरती थी। वह संजीवनी शक्ति का कार्य करती थी।


प्रश्न 19. ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में किस प्रकार पुरानी व्यवस्था और नई व्यवस्था के टकराव से उत्पन्न समस्या को व्यक्त किया गया है? लिखिए। 

उत्तर: ‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में पुरानी और नई व्यवस्था के टकराव से उत्पन्न समस्या को व्यक्त किया है। पुरानी व्यवस्था में राजदरबार लोक कलाकारों को संरक्षण प्रदान करता था। उनके सहारे ये जीवित रहते थे, परंतु नई व्यवस्था में विलायती दृष्टिकोण को अपनाया गया। लोक कलाकार हाशिए पर चले गए।


पाठ 5, शिरीष के फूल ( हजारीप्रसाद द्विवेदी) 


प्रश्न 1. लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत ( संन्यासी ) की तरह क्यों माना है? (CBSE-2010)

                                            अथवा

शिरीष को ‘अद्भुत अवधूत’ क्यों कहा गया है? (CBSE-2014, 2017)

उत्तर: लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत कहा है। अवधूत वह संन्यासी होता है जो विषय-वासनाओं से ऊपर उठ जाता है, सुख-दुख हर स्थिति में सहज भाव से प्रसन्न रहता है तथा फलता-फूलता है। वह कठिन परिस्थितियों में भी जीवन-रस बनाए रखता है। इसी तरह शिरीष का वृक्ष है। वह भयंकर गरमी, उमस, लू आदि के बीच सरस रहता है। वसंत में वह लहक उठता है तथा भादों मास तक फलता-फूलता रहता है। उसका पूरा शरीर फूलों से लदा रहता है। उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, तब भी शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है, वह काल व समय को जीतकर लहलहाता रहता है।

प्रश्न 2. हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है – प्रस्तुत पीठ के आधार पर स्पष्ट करें। (सैंपल पेपर-2013) (CBSE-2017)

उत्तर: परवर्ती कवि ये समझते रहे कि शिरीष के फूलों में सब कुछ कोमल है अर्थात् वह तो कोमलता का आगार हैं लेकिन विवेदी जी कहते हैं कि शिरीष के फूलों में कोमलता तो होती है लेकिन उनका व्यवहार (फल) बहुत कठोर होता है। अर्थात् वह हृदय से तो कोमल है किंतु व्यवहार से कठोर है। इसलिए हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार का कठोर होना अनिवार्य हो जाता है।

प्रश्न 3. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें। (CBSE-2008)

उत्तर: द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। शिरीष का वृक्ष भयंकर गरमी सहता है, फिर भी सरस रहता है। उमस व लू में भी वह फूलों से लदा रहता है। इसी तरह जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएँ मनुष्य को सदैव संघर्ष करते रहना चाहिए। उसे हार नहीं माननी चाहिए। भ्रष्टाचार, अत्याचार, दंगे, लूटपाट के बावजूद उसे निराश नहीं होना चाहिए तथा प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाते रहना चाहिए।

प्रश्न 4.हाय, वह अवधूत आज कहाँ है! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देहबल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?

उत्तर: लेखक कहता है कि आज शिरीष जैसे अवधूत नहीं रहे। जब-जब वह शिरीष को देखता है तब-तब उसके मन में ‘हूक-सी’ उठती है। वह कहता है कि प्रेरणादायी और आत्मविश्वास रखने वाले अब नहीं रहे। अब तो केवल देह को प्राथमिकता देने वाले लोग रह रहे हैं। उनमें आत्मविश्वास बिलकुल नहीं है। वे शरीर को महत्त्व देते हैं, मन को नहीं। इसीलिए लेखक ने शिरीष के माध्यम से वर्तमान सभ्यता का वर्णन किया है।

प्रश्न 5. आशय स्पष्ट कीजिए- 

क) दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हैं। जमे कि मरे।

ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?…मैं कहता हूँ कि कवि बनना है मेरे दोस्तों, तो फक्कड़ बनो।

ग) फल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अंगुली है। वह इशारा है।

उत्तर: लेखक कहता है कि संसार में जीवनी शक्ति और सब जगह समाई कालरूपी अग्नि में निरंतर संघर्ष चलता रहता है। बुद्धिमान निरंतर संघर्ष करते हुए जीवनयापन करते हैं। संसार में मूर्ख व्यक्ति यह समझते हैं कि वे जहाँ हैं, वहीं देर तक डटे रहेंगे तो कालदेवता की नजर से बच जाएँगे। वे भोले हैं। उन्हें यह नहीं पता कि एक जगह बैठे रहने से मनुष्य का विनाश हो जाता है। लेखक गतिशीलता को ही जीवन मानता है। जो व्यक्ति हिलते-डुलते रहते हैं, स्थान बदलते रहते हैं तथा प्रगति की ओर बढ़ते रहते हैं, वे ही मृत्यु से बच सकते हैं। लेखक जड़ता को मृत्यु के समान मानता है तथा गतिशीलता को जीवन।

लेखक कहता है कि कवि को सबसे पहले अनासक्त होना चाहिए अर्थात तटस्थ भाव से निरीक्षण करने वाला होना चाहिए। उसे फक्कड़ होना चाहिए अर्थात उसे सांसारिक आकर्षणों से दूर रहना चाहिए। जो अपने किए कार्यों का लेखा-जोखा करता है, वह कवि नहीं बन सकता। लेखक का मानना है कि जिसे कवि बनना है, उसे फक्कड़ बनना चाहिए।

लेखक कहता है कि फल व पेड़-दोनों का अपना अस्तित्व है। वे अपने-आप में समाप्त नहीं होते। जीवन अनंत है। फल व पेड़, वे किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई औगुली हैं। यह संकेत है कि जीवन में अभी बहुत कुछ है। सुंदरता व सृजन की सीमा नहीं है। हर युग में सौंदर्य व रचना का स्वरूप अलग हो जाता है।

पाठ के आसपास

प्रश्न 6. शिरीष के पुष्य को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?

उत्तर: शिरीष का फूल प्रचंड गरमी में भी खिला रहता है। वह लू और उमस में भी जोर शोर से खिलता है अर्थात् विषम परिस्थितियों में भी वह समता का भाव रखता है। इसीलिए लेखक ने शिरीष को शीतपुष्प का अर्थ है ठंडक देने वाला फूल और शिरीष का फूल भयंकर गरमी में भी ठंडक प्रदान करता है।

प्रश्न 7. कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधी जी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए?

उत्तर: गांधी जी सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि कोमल भावों से युक्त थे। वे दूसरे के कष्टों से द्रवित हो जाते थे। वे अंग्रेजों के प्रति भी कठोर न थे। दूसरी तरफ वे अनुशासन व नियमों के मामले में कठोर थे। वे अपने अधिकारों के लिए डटकर संघर्ष करते थे तथा किसी भी दबाव के आगे झुकते नहीं थे। ब्रिटिश साम्राज्य को उन्होंने अपनी दृढ़ता से ढहाया था। इस तरह गांधी के व्यक्तित्व की विशेषता-कोमल व कठोर भाव बन गए थे।


अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 8. शिरीष, अवधूत और गांधी जी एक-दूसरे के समान कैसे हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (CBSE-2013)

उत्तर: शिरीष के अवधूत रूप के कारण लेखक को महात्मा गांधी की याद आती है। शिरीष तरु अवधूत की तरह, बाहय परिवर्तन धूप, वर्षा, आँधी, लू-सब में शांत बना रहता है तथा पुष्पित-पल्लवित होता रहता है। इनकी तरह ही महात्मा गांधी भी मारकाट, अग्निदाह, लूटपाट, खून खच्चर को बवंडर के बीच स्थिर रह सके थे। इस समानता के कारण लेखक गांधी जी को याद करता है। जिस तरह शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल व कठोर हो सकता है, उसी तरह महात्मा गांधी भी कोमल-कठोर व्यक्तित्व वाले थे। यह वृक्ष और मनुष्य दोनों ही अवधूत हैं।


प्रश्न 9. ‘हाय वह अवधूत आज कहाँ है!’ लेखक ने यहाँ किसे स्मरण किया है? क्यों? (CBSE-2016)

                                           अथवा

हजारी प्रसाद विवेदी ने शिरीष के संदर्भ में महात्मा गांधी का स्मरण क्यों किया है? साम्य निरूपित कीजिए। (CBSE-2016)

उत्तर: ‘हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!’-लेखक ने यहाँ महात्मा गांधी का स्मरण किया है। शिरीष भयंकर गरमी व लू में भी सरस वे फूलदार बना रहता है। गांधी जी अपने चारों छाए अग्निकांड और खून-खच्चर के बीच स्नेही, अहिंसक व उदार दोनों एक समान कठिनाइयों में जीने वाले सरस व्यक्तित्व हैं।


पाठ 6,श्रम-विभाजन और जातिप्रथा(डाॅ भीमराव आंबेडकर)


प्रश्न 1. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं? 

उत्तर: जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के निम्नलिखित तर्क हैं –

जाति-प्रथा, श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन भी करती है।सभ्य समाज में श्रम-विभाजन आवश्यक है, परंतु श्रमिकों के विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन किसी अन्य देश में नहीं है।भारत की जाति-प्रथा में श्रम-विभाजन मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं होता। वह मनुष्य की क्षमता या प्रशिक्षण को दरकिनार करके जन्म पर आधारित पेशा निर्धारित करती है।जु:शुल्यक विपितपिस्थितयों मेंपेश बालक अनुपितनाह देता फल भूखे मरने की नौबत आ जाती है।


प्रश्न 2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है? 

उत्तर: जातिप्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण बनती रही है क्योंकि यहाँ जाति प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। उसे पेशा बदलने की अनुमति नहीं होती। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है क्योंकि उद्योग धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है।

ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य को पेशा न बदलने की स्वतंत्रता न हो तो भुखमरी व बेरोजगारी बढ़ती है। हिंदू धर्म की जातिप्रथा किसी भी व्यक्ति को पैतृक पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती। आज यह स्थिति नहीं है। सरकारी कानून, समाज सुधार व शिक्षा के कारण जाति प्रथा के बंधन कमजोर हुए हैं। पेशे संबंधी बंधन समाप्त प्राय है। यदि व्यक्ति अपना पेशा बदलना चाहे तो जाति बाधक नहीं है।


प्रश्न 3. लेखक के मत से दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है? (CBSE-2011, 2012, 2013, 2014, 2016, 2017)

उत्तर: लेखक के मत से ‘दासता’ से अभिप्राय केवल कानूनी पराधीनता नहीं है। दासता की व्यापक परिभाषा है-किसी व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता न देना। इसका सीधा अर्थ है-उसे दासता में जकड़कर रखना। इसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार व कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है।


प्रश्न 4.शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?

उत्तर: शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर समता को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह इसलिए करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने के लिए समान अवसर मिलने चाहिए। वे शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर असमान व्यवहार को अनुचित मानते हैं। उनका मानना है कि समाज को यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है। तो उसे समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर व समान व्यवहार उपलब्ध करवाने चाहिए। राजनीतिज्ञों को भी सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए। समान व्यवहार और स्वतंत्रता को सिद्धांत ही समता का प्रतिरूप है। सामाजिक उत्थान के लिए समता का होना अनिवार्य हैं।


प्रश्न 5. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?

उत्तर: हम लेखक की बात से सहमत हैं। उन्होंने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। भावनात्मक समत्व तभी आ सकता है जब समान भौतिक स्थितियाँ व जीवन-सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। समाज में जाति-प्रथा का उन्मूलन समता का भाव होने से ही हो सकता है। मनुष्य की महानता उसके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप होनी चाहिए। मनुष्य के प्रयासों का मूल्यांकन भी तभी हो सकता है जब सभी को समान अवसर मिले। शहर में कान्वेंट स्कूल व सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों के बीच स्पर्धा में कान्वेंट स्कूल का विद्यार्थी ही जीतेगा क्योंकि उसे अच्छी सुविधाएँ मिली हैं। अत: जातिवाद का उन्मूलन करने के बाद हर व्यक्ति को समान भौतिक सुविधाएँ मिलें तो उनका विकास हो सकता है, अन्यथा नहीं।


प्रश्न 6. आदर्श समाज के तीन तत्वों में से एक भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातृता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/ समझेंगी?

उत्तर: लेखक ने अपने आदर्श समाज में भ्रातृता के अंतर्गत स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है। भ्रातृता से अभिप्राय भाईचारे की भावना अथवा विश्व बंधुत्व की भावना से है। जब यह भावना किसी व्यक्ति विशेष या लिंग विशेष की है ही नहीं तो स्त्रियाँ स्वाभाविक रूप से इसमें सम्मिलित हो जाती हैं। आखिर स्त्री का स्त्री के प्रति प्रेम भी तो बंधुत्व की भावना को ही प्रकट करता है। इसलिए मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि यह शब्द पूर्णता का द्योतक है।


प्रश्न 7. डॉ० आंबेडकर के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए – गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। क्या आज भी यह स्थिति विद्यमान है। (CBSE-2010)

उत्तर: डॉ० आंबेडकर ने भारत की जाति प्रथा पर सटीक विश्लेषण किया है। यहाँ जातिप्रथा की जड़ें बहुत गहरी हैं। जाति व धर्म के ठेकेदारों ने लोगों के पेशे को जन्म से ही निर्धारित कर दिया भले ही वह उसमें पारंगत हो या नहीं हो। उसकी रुचि न होने पर भी उसे वही कार्य करना पड़ता था। इस व्यवस्था को श्रम विभाजन के नाम पर लागू किया गया था। आज यह – स्थिति नहीं है। शिक्षा, समाज सुधार, तकनीकी विकास, सरकारी कानून आदि के कारण जाति के बंधन ढीले हो गए हैं। व्यवसाय के क्षेत्र में जाति का महत्त्व नगण्य हो गया है।


प्रश्न 8. डॉ० भीमराव की कल्पना के आदर्श समाज की आधारभूत बातें संक्षेप में समझाइए। आदर्श सामाज की स्थापना में डॉ० आंबेडकर के विचारों की सार्थकता पर अपने विचार प्रकट कीजिए। (CBSE-2011, 2015)

उत्तर: डॉ० भीमराव आंबेडकर की कल्पना के आदर्श समाज की आधारभूत बातें निम्नलिखित हैं –उनका यह आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता व भ्रातृता पर आधारित होगा।उस समाज में गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके।ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होगा तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए।सामाजिक जीवन में अवाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। डॉ० आंबेडकर के विचार निश्चित रूप से क्रांतिकारी हैं, परंतु व्यवहार में यह बेहद कठिन हैं। व्यक्तिगत गुणों के कारण जो वर्ग समाज पर कब्ज़ा किए हुए हैं, वे अपने विशेषाधिकारों को आसानी से नहीं छोड़ सकते। यह समाज कुछ सीमा तक ही स्थापित हो सकता है।


प्रश्न 9. जाति और श्रम विभाजन में बुनियादी अंतर क्या है? ‘ श्रम विभाजन और जातिप्रथा’ के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तर: जाति और श्रम विभाजन में बुनियादी अंतर यह है कि जाति के नियामक विशिष्ट वर्ग के लोग हैं। जाति वाले व्यक्तियों की इसमें कोई भूमिका नहीं है। ब्राह्मणवादी व्यवस्थापक अपने हितों के अनुरूप जाति व उसका कार्य निर्धारित करते हैं। वे उस पेशे को विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं बदलने देते, भले ही लोग भूखे मर गए। श्रम विभाजन में कोई व्यवस्थापक नहीं होता। यह वस्तु की माँग, तकनीकी विकास या सरकारी फैसलों पर आधारित होता है। इसमें व्यक्ति अपना पेशा बदल सकता है।


प्रश्न 10. लोकतंत्र से लेखक को क्या अभिप्राय है?

उत्तर: लेखक कहता है कि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है। यह मूलतः सामूहिक दिनचर्या की एक रीति और समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। उनका मानना है कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का नाम ही लोकतंत्र है। इसमें सभी का सहयोग होना चाहिए।


प्रश्न 11. लेखक ने मनुष्य की क्षमता के बारे में क्या बताया है।

उत्तर: लेखक बताता है कि मनुष्य की क्षमता तीन बातों पर निर्भर करती हैं –शारीरिक वंश परंपरासामाजिक उत्तराधिकार अर्थात् सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि सभी उपलब्धियाँ जिसके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्ट शिक्षा प्राप्त करता है।मनुष्य के अपने प्रयत्न

लेखक का मानना है कि असमान प्रयत्न के कारण असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। वे प्रथम दो बातों पर असमानता को अनुचित मानते हैं।


प्रश्न 12. “श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जातिप्रथा गंभीर दोषों से युक्त है।” स्पष्ट करें।

उत्तर: लेखक कहता है कि श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जातिप्रथा दोषों से युक्त है। इस विषय में लेखक निम्नलिखित तर्क देता है –

जातिप्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा से नहीं होता।मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्त्व नहीं रहता।जातिप्रथा के कारण मनुष्य में दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने वे कम काम करने की भावना उत्पन्न होतीजातिप्रथा के कारण श्रम विभाजन होने पर निम्न कार्य समझे जाने वाले कार्यों को करने वाले श्रमिक को भी हिंदू समाज घृणित व त्याज्य समझता है।


प्रश्न 13. डॉ० आंबेडकर ‘समता’ को काल्पनिक वस्तु क्यों मानते हैं?

उत्तर: डॉ० आंबेडकर का मानना है कि जन्म, सामाजिक स्तर, प्रयत्नों के कारण भिन्नता व असमानता होती है। पूर्व समता एक काल्पनिक स्थिति है। इसके बावजूद वे सभी मनुष्यों को विकसित होने के समान अवसर देना चाहते हैं। वे सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार चाहते हैं।


नोट : उपर्युक्त सामग्री इंटरनेट एवं अन्य  विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है। अतः एक बार अपने स्तर पर तथ्यों की प्रमाणिकता एवं शुद्धता की जाँच अवश्य कर लें।






Sunday, November 10, 2024

 



राजभाषा नीति संबंधी आदेश

राजभाषा नीति संबंधी आदेश

सामान्‍य ओदश की परिभाषा

स्‍थायी प्रकार के सभी आदेश निर्णय, अनुदेश, परिपत्र जो विभागीय प्रयोग के लिए हों तथा ऐसे सभी आदेश, अनुदेश, पत्र, ज्ञापन, नोटिस आदि जो सरकारी कर्मचारियों के समूह अथवा समूहों के संबंध में या उनके लिए हों, राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अधीन सामान्‍य आदेश कहलाते हैं ।

 क्षेत्र में चैक/ड्राफ्ट हिंदी में तैयार किया जाना

 क्षेत्र में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों द्वारा सभी चैक यथासंभव हिंदी में तैयार किए जाएं । क क्षेत्र में स्थित सरकारी बैंकों द्वारा  क्षेत्र के लिए तैयार किए गए चैक और ड्राफ्ट यथासंभव हिंदी में जारी किए जाएं ।

लिफाफों पर पते हिंदी में लिखना और पता लिखने, बिल बनाने आदि में मशीनों का प्रयोग

 तथा  क्षेत्र में स्‍थित कार्यालयों में पता लेखी-मशीन के साथ देवनागरी एम्‍बोसिंग मशीनें लगाई जाएं और चूँकि  क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों में भी कई बड़े-बड़े कार्यालय ऐसे हैं जिनमें काफी पत्र-व्‍यवहार  तथा  क्षेत्र के कार्यालयों से होता है अतः  क्षेत्र में स्थित कार्यालयों में भी द्विभाषी पता लेखी मशीनों का प्रावधान किया जाये ।

नाम पट्ट, रबड की मोहरें, कार्यालय की मुद्राएं, पत्र शीर्ष और लोगो (प्रतीक)

  1. भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों तथा अन्‍य कार्यालयों में प्रयोग में आने वाली सभी रबड़ की मोहरें और कार्याल्‍य की मुद्राएं द्विभाषिक रूप में हिंदी के शब्‍द ऊपर रखते हुए प्रयोग की जाएं ।
  2. पदनाम, कार्यालय का नाम, पता आद के बारे में जो मोहरें वर्तमान आदेशों के अनुसार द्विभाषी रूप में बनाई जाती है , वे इस प्रकार बनाई जाएं कि उनमें एक पंक्ति हिंदी की और फिर एक पंक्ति अंग्रेजी की हो या एक ही पंक्ति में हिंदी और उसके बाद अंग्रेजी में लिखा हो । ये निदेश बनाई जाने वाली मोहरों पर लागू किए जाएं ।
  3. जो मोहरें टिप्‍पणी आदि की जगह बनाई जाती हैं वे या तो द्विभाषाी बनाई जाएं या  तथा  क्षेत्र के कार्यालयों आदि में केवल हिंदी में और  क्षेत्र के कार्यालयों में केवल हिंदी अंग्रेजी में बनवा ली जाएं ।
  4. रबड़ की मोहरें तैयार करते समय सभी भाषाओं के अक्षर सामान आकार के होने चाहिए ।
  5.  तथा  क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों में नाम पट्ट रबड़ की मोहरें, पत्र शीर्ष, लोगो (प्रतीक) आदि द्विभाषी रूप में बनवाए जाएं ।

नाम पट्टों, रबड़ मोहरों आदि पर देवनागरी रूप में नाम लिखने की विधि 

देवनागरी के नाम पट्टों, मोहरों, आदि पर पूरा नाम तो एक रीति से लिख जा सकता है, परन्‍तु संक्षिप्‍त नाम लिखने के लिए अनेक पद्धतियां प्रचलित हैं । उदाहरण के लिए यदि किसी व्‍यक्ति का नाम दीनानाथ शर्मा है, तो देवनागरी लिपि में उसका संक्षिप्‍तम नाम दिए हुए विकल्‍प में से किसी एक के अनुसार लिखा जा सकता हैः-

  1. देवनागरी वर्णमाला के अनुसार, मात्राओं का प्रयोग करते हुए, आद्य अक्षर लिख कर जैसे, दी.ना.शर्मा ।
  2. देवनागरी वर्णमाला के अनुसार, बिना मात्रओं के प्रयोग के आद्य अक्षर लिखकर जैसे द.न.शर्मा ।
  3. नाम के आद्य अक्षर रोमन वर्णमाला के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखकर जैसे डी.एन.शर्मा ।

सम्‍मेलनों में साइन बोर्डों के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग

विभिन्‍न मंत्रालयों द्वारा आयोजित सभी सम्‍मेलनों और बैठकों में विशेषकर दिल्‍ली में सभी साइन बोर्डों आदि पर दोनों भाषाओं का प्रयोग होना चाहिए ।

सरकारी समारोहों के लिए निमंत्रण पंत्र

सभी सरकारी समारोहों के निमंत्रण पत्र हिदी और अंग्रेजी में जारी किए जाएं । कार्ड के एक ओर अंग्रेजी होनी चाहिए और दूसरी ओर हिंदी । आवश्‍यकता के अनुसार इनमें हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्‍त प्रादेशिक भाषओं का भी उपयोग किया जा सकता है । त्रिभाषिक निमंत्रण-पत्र किस प्रकार छापे जाएं, यह बात संयोजक पर छोड़ दी गई है ।

फाइल कवरों पर विषय हिंदी में

मंत्रालयों/विभागों और हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध व अधीनस्‍थ कार्यालयों में निम्‍नलिखित प्रकार की सभी फाइलों के फाइल कवरों पर विषय हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखे जाएः

1. जिन फाइलों में टिप्पण तथा पत्र हिंदी में हैं ।

2. उन अनुभागों की फाइलों पर जिनमें 80 प्रतिशत या ज्‍यादा कर्मचारी हिंदी जानते हैं ।

3. हिंदी जानने वाले या हिंदी में प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा निपटाई जाने वाली फाइलें ।

अन्‍य मामलों में भी जहां तक हो सके स्‍वैच्छिक रूप से इसी प्रकार की पद्धति अपनाई जाए । अहिन्‍दी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालयों में हिंदी जानने वाले या हिंदी सीखे हुए कर्मचारियों की उपलब्‍धता के आधार पर यह पद्धति अपनाई जाए ।

स्‍टाफ कार की प्‍लेटों पर नाम

मंत्रालयों/विभागों और हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालयों में स्‍टाफ कारों की प्‍लेटों पर कायालयों के नाम अंग्रेजी और हिंदी दोनो भाषाओं में लिखवाएं जाएं । हिंदी में नाम ऊपर हो और अंग्रेजी में उसके नीचे ।

प्रदर्शनियों में हिंदी का प्रयोग

हिंदी भाषी क्षेत्रों में या उन क्षेत्रों में जहां की अधिकांश जनता हिंदी समझती है, प्रदर्शनियों में प्रचार माध्‍यम के रूप में हिंदी का अधिकाधिक इस्‍तेमाल किया जाए । इन क्षेत्रों में प्रदर्शनियों में प्रचार सामग्री भी यथासंभव हिंदी में उपलब्‍ध कराइ जाए । ट्रेड फेयर अथारिटी आफ इंडिया द्वारा आयोजित प्रदर्शनियों में भाग लेने वाली सरकारी तथ सार्वजनिक क्षेत्र के संस्‍थानों द्वारा प्रदर्शनियों आदि में हिंदी का उपयुक्‍त प्रयोग किया जाए और अपने मंडपों में वस्‍तुओं के नाम /परिचय आदि देने में हिंदी का समुचित प्रयोग किया जाए ।

मैनुअलों, फार्मों, कोडों आदि की हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषी (डिगलॉट रूप में ) छपाई

मैनुअलों, फार्मों, कोडों आदि की हिंदी-अंग्रेजी (डिगलॉट रूप में ) द्विभाषी छपवाए जाएं । फार्मों उपक्रमों, राष्‍ट्रीयकृत बैंकों आदि द्वारा केवल अंग्रेजी के फार्म ही प्रयोग में लाए जा रहे हैं, जो कि राजभाषा यिम 1976 के नियम 11 के अनुदेशों के प्रतिकूल हैं ।

इस संबंध में राजभाषा नियम 12 की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट किया जाता है जिसके अंतर्गत प्रत्‍येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का उत्तरादायित्‍व है कि वह राजभाषा अधिनियम और राजभाषा निमय के उपबन्‍धों का समुचित अनुपालन करवाए । अतः सभी मंत्रालयों/विभागों से पुनः अनुरोध है कि वे अपने सभी सम्‍बद्ध /अधीनस्‍थ कार्यालयों, उपक्रमों बैंकों आदि में प्रयोग हो रहे सभी फार्म आदि अनिवार्यतः द्विभाषी रूप में उपलब्‍ध व प्रयोग करना सुनिश्चित करें ।

फार्मों का द्विभाषी उपलब्‍ध करवाना

यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई फार्म न तो एक भाषा में छपे, न ही एक भाषा में जारी किया जाय । यदि किसी विशेष स्थिति में कोई फार्म हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अलग-अलग छपे तो उस फार्म के हिंदी और अंग्रेजी रूपान्‍तर सभी जगह उपलब्‍ध रहने चाहिए और इस बात का ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि जनता का कोई व्यक्ति इनमें से जिस भाषा का फार्म मांगे वह फार्म उस भाषा में उसे मिल सके ।

सम्‍मेलनों, बैठकों की कार्यसूची/कार्यसूची की टिप्पणियां / कार्यवृत्त हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषी रूप में

मंत्रालयो/विभागों तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित केन्‍द्रीय सरकार के संबंद्ध तथा अधीनस्थ कार्यालयों और रनके नियंत्रण में या स्‍वामित्‍व में काम करने वाली कंपनियों तथा निगमों की अंतर विभागीय तथा विभागीय बैठकों व सम्‍मेलनों की कार्यसूची, कार्यरूप की टिप्पणियों और कार्यावृत्त को हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जारी किया जाए । जो विषय बहुत बाद में कार्य सूची में शामिल किए जाने आवश्‍यक है, उनके लिए अपवाद हो सकता है ।

 क्षेत्र में स्थित मंत्रालय/विभागों और कार्यालयों/उपक्रमों आदि की बैठकों की कार्यसूची तथा कार्यवृत्‍त केवल हिंदी में जारी करनाः केवल  क्षेत्र में परिचालित होने वाली कार्यसूची/कार्यवृत्त आदि एवं उससे संबंधित पत्राचार केवल हिंदी में परिचालित किए जा सकते हैं ।

बिल्‍लों पर हिंदी का प्रयोग

केंद्रीय सरकार के अधिकारी / कर्मचारी अपनी सेवा अथवा कार्यालय नाम के बिल्‍ले अंग्रेजी साथ-साथ हिंदी में भी लगाएं । टोपी और कंधे पर लगाए जाने वाले प्रतीक चिह्न और सेवा संबंधी बिल्‍ले जो संगठन और सेवा के प्रतीक होते हैं, केवल देवनागी मैं तैयार किए जा सकते हैं । वर्दियों पर काढ़ेजाने वाले नाम भी दोनों भाषाओं में काढ़े जाएं । यह आदेश केंद्रीय सरकार के सभी राज्‍यों में काम कर रहे वर्दी पहनने वाले कर्मचारियों / अधिकारियों पर लागू होते हैं ।

कर्मचारियों की सेवा पुस्तिकाओं । रजिस्‍टरों में प्रविष्टियाँ

 व  क्षेत्रों में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में रखे जाने वाले रजिस्‍टरों/सेवा पुस्तिकाओं में प्रविष्टियॉं हिंदी में की जाएं ।  क्षेत्र में स्थित कार्यालयों में ऐसी प्रविष्टियॉं यथासंभव हिंदी में की जाएं ।

पियन बुकों में प्रविष्टियाँ

 


Saturday, November 9, 2024

हास्य कविता

 कन्या एक कुंवारी थी 

जैसे वो चिंगारी थी

वैसे तेज कटारी थी

लेकिन मन की प्यारी थी 


सखियों से बतियाती थी

छोरों से घबराती थीं 

मुझसे कुछ शर्माती थी 

बस से कॉलेज जाती थी 

अंतर मन डिस्क्लोज किया 

एक दिन उसे प्रपोज किया 

पहले वह नाराज हुई 

तबीयत कुछ नासाज हुई 

फिर बोली यह ठीक नहीं

अपनी ऐसी लीक नहीं 

लिखने पढ़ने के दिन हैं 

आगे बढ़ने के दिन हैं 

ये बातें फिर कर लेंगे 

इश्क मोहब्बत पढ़ लेंगे

अभी न मन को हीट करो 

एम ए तो कंप्लीट करो

उसने यूं रेस्पॉन्ड किया 

प्रोपोजल पोस्पोन्ड किया 

हमसे हिम्मत नहीं हरी

मन में ऊर्जा नई भरी

रात रात भर पढ़पढ़ के 

नई इबारत गढ़ गढ़  के 

ऐसा सबको शाॅक दिया 

मैंने कॉलेज टॉप किया 

अब तो मूड सुहाना था 

उसने भी मन जाना था 

लेकिन राज पुराना था 

फिर एक नया बहाना था 


जोब करो कोई ढंग की 

फिर स्टेटस की नौटंकी 

कभी कास्ट का पेज फंसा

कभी बाप को नहीं जंचा

थक कर रोज झमेले में

नौचंदी के मेले में 

एक दिन जी कैड़ा करके 

कहा उसे यूं जाकर के

जो कह दोगी कर लूंगा 

 कहो हिमालय चढ़ लूंगा 

लेकिन क्लियर बात करो 

ऐसे ना जज्बात हरो

या तो तुम अब हां कर दो 

या फिर साफ मना कर दो 


सुनकर कन्या मौन हुई 

हर चालाकी गौण हुई 

तभी नया छल कर लाई 

आंख में आंसू भर लाई 

हिम्मत को कर ढेर गई 

प्रण पर आंसू फेर गई 


पुनः प्रपोजल बीट हुआ 

नखरा नया रिपीट हुआ 

थोड़ा सा तो वेट करो 

पहले पतला पेट करो 

जॉइन कोई जिम कर लो 

तोंद जरा सी डिम कर लो 

खुशबू सी खिल जाऊंगी 

मैं तुमको मिल जाऊंगी 


3 साल का वादा कर 

निज क्षमता से ज्यादा कर 

हीरो जैसी बॉडी से 

ड्रेसिंग वाली रोडी से 

बेहतर फिजिक बना न लूं 

6-6 पैक बना ना लूं 

सूरत नहीं दिखाऊंगा 

तुझको नहीं सताऊंगा

रात और दिन श्रम करके 

खाना पीना कम करके

रूखी सूखी खाकर के

सरपट दौड़ लगा करके 

सोने सी  काया कर ली

फिर मन में ऊर्जा भरली 

उसे ढूंढने निकल पड़ा 

मगर प्रेम में खलल पड़ा 

चुन्नी बांध पुछल्ले में 

किसी और के छल्ले में 


वह जूही की कली गई 

किसी और की गली गई 

शादी करके चली गई 

हाय रे किस्मत छली गई 


थका थका  हारा हारा

मैं बदकिस्मत बेचारा 

पल में दुनिया घूम लिया 

हर फंदे पर लूम लिया 

कभी मिली तो पूछूंगा 

अपने आंसू पोंछूगा

क्यों मेरा दिल तोड़ गई 

प्यार जता कर छोड़ गई




कुछ दिन बाद दिखाई दी 

वह आवाज सुनाई दी 

छोड़ा था नौचंदी में 

पाई सब्जी मंडी में

कैसा घूमा लूप सुनो 

उसका अनुपम रूप सुनो

वह जो एक छरहरी थी 

कंचन देह सुनहरी थी 

अब दो की महतारी थी 

तीजे की तैयारी थी 


उलझे उलझे बाल हुए 

फूले फूले गाल हुए

इन बेढंगे हालों ने 

दिल के फूटे छालों ने

सपनों में विष घोला था

एक हाथ में झोला था 

एक हाथ में मूली थी 

खुद भी फूली फूली थी

सब सुंदरता लूली थी 

आशा फांसी झूली थी 

विधिना के यह खेल कड़े 

देख रहा था खड़े-खड़े 


तभी अचानक सधे हुए 

दो बच्चों से लदे हुए 

चिक चिक से कुछ थके हुए 

बाल-वाल सब पके हुए

एक अंकल जी प्रकट हुए 

दर्शन कितने विकट हुए


एक अंकल जी प्रकट हुए 

दर्शन कितने विकट हुए

52 इंची कमरा था 

इसी कली का भ्रमरा था 

तूफानों ने पाला था 

मुझसे ज्यादा काला था


मुझसे अधिक उदास था वो 

केवल 10वीं पास था वो

रानी साथ मदारी के 

फूटे भाग बिचारी के 


घूरे मेला लूट गए 

तितली के पर टूट गए 

रचा स्वयंवर वीरों का 

मंडप मांडा जीरो का 

गरम तवे पर फैल गई 

किस खूसट के गैल गई

बिना मिले वापस आया 

कई दिनों तक पछताया

अब भी अक्सर रातों में 

कुछ गहरे जज्बातों में 

पिछली यादें ढोता हूं 

सबसे छुपकर रोता हूं

मुझ में क्या कम था ईश्वर 

किस्मत में क्या गम था ईश्वर 

अब भी आंसू बहते हैं 

भाग्य इसी को कहते हैं


कवि - चिराग जैन


Monday, October 2, 2023

राजभाषा नीति संबंधी आदेश

राजभाषा नीति संबंधी आदेश

सामान्‍य आदेश की परिभाषा

स्‍थायी प्रकार के सभी आदेश निर्णय, अनुदेश, परिपत्र जो विभागीय प्रयोग के लिए हों तथा ऐसे सभी आदेश, अनुदेश, पत्र, ज्ञापन, नोटिस आदि जो सरकारी कर्मचारियों के समूह अथवा समूहों के संबंध में या उनके लिए हों, राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अधीन सामान्‍य आदेश कहलाते हैं ।

 क्षेत्र में चैक/ड्राफ्ट हिंदी में तैयार किया जाना

 क्षेत्र में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों द्वारा सभी चैक यथासंभव हिंदी में तैयार किए जाएं । क क्षेत्र में स्थित सरकारी बैंकों द्वारा  क्षेत्र के लिए तैयार किए गए चैक और ड्राफ्ट यथासंभव हिंदी में जारी किए जाएं ।

लिफाफों पर पते हिंदी में लिखना और पता लिखने, बिल बनाने आदि में मशीनों का प्रयोग

 तथा  क्षेत्र में स्‍थित कार्यालयों में पता लेखी-मशीन के साथ देवनागरी एम्‍बोसिंग मशीनें लगाई जाएं और चूँकि  क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों में भी कई बड़े-बड़े कार्यालय ऐसे हैं जिनमें काफी पत्र-व्‍यवहार  तथा  क्षेत्र के कार्यालयों से होता है अतः  क्षेत्र में स्थित कार्यालयों में भी द्विभाषी पता लेखी मशीनों का प्रावधान किया जाये ।

नाम पट्ट, रबड की मोहरें, कार्यालय की मुद्राएं, पत्र शीर्ष और लोगो (प्रतीक)

  1. भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों तथा अन्‍य कार्यालयों में प्रयोग में आने वाली सभी रबड़ की मोहरें और कार्याल्‍य की मुद्राएं द्विभाषिक रूप में हिंदी के शब्‍द ऊपर रखते हुए प्रयोग की जाएं ।
  2. पदनाम, कार्यालय का नाम, पता आद के बारे में जो मोहरें वर्तमान आदेशों के अनुसार द्विभाषी रूप में बनाई जाती है , वे इस प्रकार बनाई जाएं कि उनमें एक पंक्ति हिंदी की और फिर एक पंक्ति अंग्रेजी की हो या एक ही पंक्ति में हिंदी और उसके बाद अंग्रेजी में लिखा हो । ये निदेश बनाई जाने वाली मोहरों पर लागू किए जाएं ।
  3. जो मोहरें टिप्‍पणी आदि की जगह बनाई जाती हैं वे या तो द्विभाषाी बनाई जाएं या  तथा  क्षेत्र के कार्यालयों आदि में केवल हिंदी में और  क्षेत्र के कार्यालयों में केवल हिंदी अंग्रेजी में बनवा ली जाएं ।
  4. रबड़ की मोहरें तैयार करते समय सभी भाषाओं के अक्षर समान आकार के होने चाहिए ।
  5.  तथा  क्षेत्रों में स्थित कार्यालयों में नाम पट्ट रबड़ की मोहरें, पत्र शीर्ष, लोगो (प्रतीक) आदि द्विभाषी रूप में बनवाए जाएं ।

नाम पट्टों, रबड़ मोहरों आदि पर देवनागरी रूप में नाम लिखने की विधि 

देवनागरी के नाम पट्टों, मोहरों, आदि पर पूरा नाम तो एक रीति से लिख जा सकता है, परन्‍तु संक्षिप्‍त नाम लिखने के लिए अनेक पद्धतियां प्रचलित हैं । उदाहरण के लिए यदि किसी व्‍यक्ति का नाम दीनानाथ शर्मा है, तो देवनागरी लिपि में उसका संक्षिप्‍तम नाम दिए हुए विकल्‍प में से किसी एक के अनुसार लिखा जा सकता हैः-

  1. देवनागरी वर्णमाला के अनुसार, मात्राओं का प्रयोग करते हुए, आद्य अक्षर लिख कर जैसे, दी.ना.शर्मा ।
  2. देवनागरी वर्णमाला के अनुसार, बिना मात्रओं के प्रयोग के आद्य अक्षर लिखकर जैसे द.न.शर्मा ।
  3. नाम के आद्य अक्षर रोमन वर्णमाला के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखकर जैसे डी.एन.शर्मा ।

सम्‍मेलनों में साइन बोर्डों के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग

विभिन्‍न मंत्रालयों द्वारा आयोजित सभी सम्‍मेलनों और बैठकों में विशेषकर दिल्‍ली में सभी साइन बोर्डों आदि पर दोनों भाषाओं का प्रयोग होना चाहिए ।

सरकारी समारोहों के लिए निमंत्रण पंत्र

सभी सरकारी समारोहों के निमंत्रण पत्र हिदी और अंग्रेजी में जारी किए जाएं । कार्ड के एक ओर अंग्रेजी होनी चाहिए और दूसरी ओर हिंदी । आवश्‍यकता के अनुसार इनमें हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्‍त प्रादेशिक भाषाओं का भी उपयोग किया जा सकता है । त्रिभाषिक निमंत्रण-पत्र किस प्रकार छापे जाएं, यह बात संयोजक पर छोड़ दी गई है ।

फाइल कवरों पर विषय हिंदी में

मंत्रालयों/विभागों और हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध व अधीनस्‍थ कार्यालयों में निम्‍नलिखित प्रकार की सभी फाइलों के फाइल कवरों पर विषय हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखे जाएं :

1. जिन फाइलों में टिप्पण तथा पत्र हिंदी में हैं ।

2. उन अनुभागों की फाइलों पर जिनमें 80 प्रतिशत या ज्‍यादा कर्मचारी हिंदी जानते हैं ।

3. हिंदी जानने वाले या हिंदी में प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा निपटाई जाने वाली फाइलें ।

अन्‍य मामलों में भी जहां तक हो सके स्‍वैच्छिक रूप से इसी प्रकार की पद्धति अपनाई जाए । अहिन्‍दी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालयों में हिंदी जानने वाले या हिंदी सीखे हुए कर्मचारियों की उपलब्‍धता के आधार पर यह पद्धति अपनाई जाए ।

स्‍टाफ कार की प्‍लेटों पर नाम

मंत्रालयों/विभागों और हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित संबद्ध और अधीनस्‍थ कार्यालयों में स्‍टाफ कारों की प्‍लेटों पर कायालयों के नाम अंग्रेजी और हिंदी दोनो भाषाओं में लिखवाएं जाएं । हिंदी में नाम ऊपर हो और अंग्रेजी में उसके नीचे ।

प्रदर्शनियों में हिंदी का प्रयोग

हिंदी भाषी क्षेत्रों में या उन क्षेत्रों में जहां की अधिकांश जनता हिंदी समझती है, प्रदर्शनियों में प्रचार माध्‍यम के रूप में हिंदी का अधिकाधिक इस्‍तेमाल किया जाए । इन क्षेत्रों में प्रदर्शनियों में प्रचार सामग्री भी यथासंभव हिंदी में उपलब्‍ध कराइ जाए । ट्रेड फेयर अथारिटी आफ इंडिया द्वारा आयोजित प्रदर्शनियों में भाग लेने वाली सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के संस्‍थानों द्वारा प्रदर्शनियों आदि में हिंदी का उपयुक्‍त प्रयोग किया जाए और अपने मंडपों में वस्‍तुओं के नाम /परिचय आदि देने में हिंदी का समुचित प्रयोग किया जाए ।

मैनुअलों, फार्मों, कोडों आदि की हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषी (डिगलॉट रूप में) छपाई

मैनुअलों, फार्मों, कोडों आदि की हिंदी-अंग्रेजी (डिगलॉट रूप में) द्विभाषी छपवाए जाएं । फार्मों उपक्रमों, राष्‍ट्रीयकृत बैंकों आदि द्वारा केवल अंग्रेजी के फार्म ही प्रयोग में लाए जा रहे हैं, जो कि राजभाषा नियम 1976 के नियम 11 के अनुदेशों के प्रतिकूल हैं ।

इस संबंध में राजभाषा नियम 12 की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट किया जाता है जिसके अंतर्गत प्रत्‍येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का उत्तरादायित्‍व है कि वह राजभाषा अधिनियम और राजभाषा निमय के उपबन्‍धों का समुचित अनुपालन करवाए । अतः सभी मंत्रालयों/विभागों से पुनः अनुरोध है कि वे अपने सभी सम्‍बद्ध /अधीनस्‍थ कार्यालयों, उपक्रमों बैंकों आदि में प्रयोग हो रहे सभी फार्म आदि अनिवार्यतः द्विभाषी रूप में उपलब्‍ध व प्रयोग करना सुनिश्चित करें ।

फार्मों का द्विभाषी उपलब्‍ध करवाना

यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई फार्म न तो एक भाषा में छपे, न ही एक भाषा में जारी किया जाय । यदि किसी विशेष स्थिति में कोई फार्म हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अलग-अलग छपे तो उस फार्म के हिंदी और अंग्रेजी रूपान्‍तर सभी जगह उपलब्‍ध रहने चाहिए और इस बात का ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि जनता का कोई व्यक्ति इनमें से जिस भाषा का फार्म मांगे वह फार्म उस भाषा में उसे मिल सके ।

सम्‍मेलनों, बैठकों की कार्यसूची/कार्यसूची की टिप्पणियां / कार्यवृत्त हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषी रूप में

मंत्रालयो/विभागों तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों में स्थित केन्‍द्रीय सरकार के संबंद्ध तथा अधीनस्थ कार्यालयों और रनके नियंत्रण में या स्‍वामित्‍व में काम करने वाली कंपनियों तथा निगमों की अंतर विभागीय तथा विभागीय बैठकों व सम्‍मेलनों की कार्यसूची, कार्यरूप की टिप्पणियों और कार्यवृत्त को हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जारी किया जाए । जो विषय बहुत बाद में कार्य सूची में शामिल किए जाने आवश्‍यक है, उनके लिए अपवाद हो सकता है ।

 क्षेत्र में स्थित मंत्रालय/विभागों और कार्यालयों/उपक्रमों आदि की बैठकों की कार्यसूची तथा कार्यवृत्‍त केवल हिंदी में जारी करनाः केवल  क्षेत्र में परिचालित होने वाली कार्यसूची/कार्यवृत्त आदि एवं उससे संबंधित पत्राचार केवल हिंदी में परिचालित किए जा सकते हैं ।

बिल्‍लों पर हिंदी का प्रयोग

केंद्रीय सरकार के अधिकारी / कर्मचारी अपनी सेवा अथवा कार्यालय नाम के बिल्‍ले अंग्रेजी साथ-साथ हिंदी में भी लगाएं । टोपी और कंधे पर लगाए जाने वाले प्रतीक चिह्न और सेवा संबंधी बिल्‍ले जो संगठन और सेवा के प्रतीक होते हैं, केवल देवनागी मैं तैयार किए जा सकते हैं । वर्दियों पर काढ़ेजाने वाले नाम भी दोनों भाषाओं में काढ़े जाएं । यह आदेश केंद्रीय सरकार के सभी राज्‍यों में काम कर रहे वर्दी पहनने वाले कर्मचारियों / अधिकारियों पर लागू होते हैं ।

कर्मचारियों की सेवा पुस्तिकाओं, रजिस्‍टरों में प्रविष्टियाँ

 व  क्षेत्रों में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में रखे जाने वाले रजिस्‍टरों/सेवा पुस्तिकाओं में प्रविष्टियॉं हिंदी में की जाएं।  क्षेत्र में स्थित कार्यालयों में ऐसी प्रविष्टियॉं यथासंभव हिंदी में की जाएं ।



Saturday, September 25, 2021

शब्दकोश और संदर्भ ग्रंथों को देखना

 शब्दकोश, संदर्भ ग्रंथों की उपयोग की विधि 11


शब्दकोश, संदर्भ ग्रंथों की उपयोग की विधि और परिचय

शब्दकोश देखने की विधि - 

शब्दकोश में सम्मिलित शब्द वर्णमाला के वर्णों के क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। अतः शब्दकोश देखने के पूर्व हमें वर्णमाला के ज्ञान के साथ-साथ शब्द का वर्ण-विच्छेद करना सीखना आवश्यक है।


शब्दकोश में शब्दों को इस वर्ण-अनुक्रम में दिया जाता है- अं, अ, आं, आ, इं, इ, ईं, ई, उं,उ, ऊं, ऊ, ऋ, एं, ए, ऐं, ऐ, ओं, ओ, औं, औ। इसके पश्चात् क से ह तक के वर्ण क्रम के अनुसार।


संयुक्ताक्षरों के विषय में यह बात विशेष ध्यान रखने योग्य है कि यदि मिले हुए वर्ण ऊपर-नीचे लिखे हैं तो ऊपर वाला वर्ण पहले स्थान पाएगा तथा नीचे वाला वर्ण बाद में स्थान पाएगा। एवं संयुक्ताक्षर की मात्रा नीचे वाले वर्ण की मानी जाएगी। जैसे-

1. शुद्धि = ( श्+उ) + (द्+ध्+इ)

2. प्रार्थना = (प्+र्+आ) +(र्+थ्+अ)+(न्+आ)


वर्ण -विच्छेद में मात्रा वाला स्वर सदा ही उस व्यंजन के बाद आता है जिस पर मात्रा लगी हो (भले ही मात्रा पीछे से लगी हो।

जैसे- सि = स्+इ

सी = स्+ई

आधे अक्षरों से पूर्व लिखी ‘इ’ की मात्रा उस अक्षर की न होकर अगले व्यंजन की होती है।

जैसे -स्थिति =स् + थि + ति

यदि मिले हुए वर्ण (संयुक्ताक्षर) ऊपर नीचे न होकर बराबर ऊँचाई पर लिखे हैं तो वर्णों का क्रम वही होगा जो दिखाई दे रहा है।

जैसे - शब्द = श+ब्+द्, पम्प = प+म्+प,  द्वार = द्+वा+र (न कि ‘ व्+दा+र)


निम्नांकित संयुक्ताक्षरों के वर्ण विच्छेद पर विशेष ध्यान दें-

क्ष =क्+ष्+अ           त्र = त्+र्+अ            ज्ञ = ज्+ञ्+अ           द्य=द्+य्+अ


अं तथ अः को स्वरों में नहीं गिना जाता है। अतः शब्दकोश में इनके लिए ओ,औ के बाद अलग से खंड नहीं होता। अनुस्वार ( बिंदु) तथा अनुनासिक (चंद्रबिंदु) वाले वर्ण शब्द कोश में सबसे पहले आएँगे। जैसे - ‘अंकुर’ तथा ‘अकुलाहट’ में से अंकुर पहले स्थान पाएगा, जबकि अकुलाहट बाद में आएगा। इसी प्रकार ‘इ’ तथा ‘इं’ में से इं से प्रारम्भ होने वाले शब्द पहले आएँगे तथा इ से प्रारम्भ होने वाले शब्द बाद में। जैसे -इंक व इकहरा में से इंक पहले आएगा तथा इकहरा बाद में आएगा।

Sunday, August 30, 2020

वचन

 वचन

जिसके द्वारा विकारी शब्द की संख्या का बोध होता है, उसे वचन कहते हैं।


वचन दो प्रकार के होते हैं।


एक वचन

बहुवचन

1. एकवचन

पद के जिस रूप से किसी एक संख्या का बोध होता है, उसे एकवचन कहते हैं।


जैसे - मेरा, तुम्हारा, नदी, वधू, कमरा।


2. बहुवचन

विकारी पद के जिस रूप से किसी की एक से अधिक संख्या का बोध होता है, उसे बहुवचन कहते हैं।


जैसे - लड़के, हमारे, कमरे, नदियां, मिठाइयां।


तथ्य

किसी शब्द के अन्तिम व्यंजन पर जो मात्रा हो वही उसका कारान्त होता है जैसे-


रमा - आकारान्त


अग्नि - इकारान्त


पितृ -ऋकान्तर


(कारक-ने,को,से,में, पर,...)परसर्ग रहित होने पर आकारान्त(रमा,चाचा,माता) शब्दों को छोड़ कर शेष शब्दों का एकवचन व बहुवचन समान रहेगा।


जैसे -अतिथि, हाथी, साधु, जन्तु, बालक, फूल, शेर, पति, मोती, शत्रु, भालू, आलू, चाक।


हिन्दी में निम्न शब्द सदैव एक वचन में ही प्रयुक्त होते हैं-

स्टील, पानी, दूध, सोना, चाँदी, लोहा, आग, तेल, घी, सत्य, झूठ, जनता, आकाश,मिठास, प्रेम, क्रोध, क्षमा, मोह, सामान, ताश, सहायता, वर्षा, जल।


हिन्दी में निम्न शब्द सदैव बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं-

होश,आँसू, आदरणीय, व्यक्ति हेतु प्रयुक्त शब्द आप,दर्शन, भाग्य, दाम, हस्ताक्षर, प्राण, समाचार, बाल, लोग, होश, हाल-चाल।